जम्मू-कश्मीर की समस्या उलझाने के लिए 'नेहरू और इंदिरा' को क्यों जिम्मेदार ठहराती है भाजपा

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 24 Jun 2021 06:54 PM IST

सार

भाजपा के चुनावी एजेंडे में दो मुद्दे सर्वोपरी रहे हैं। एक रामजन्म भूमि और दूसरा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति करना। मौजूदा समय में ये दोनों मुद्दे सुलझ चुके हैं। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेशों का दर्जा दे दिया गया है...
जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी
जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी - फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार

भाजपा के अलावा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह यह बात कई दफा सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि जम्मू कश्मीर समस्या के लिए पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी जिम्मेदार रहे हैं। शाह के मुताबिक, 1949 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध विराम की घोषणा कर बड़ी गलती की थी। वे इस मामले के निपटारे के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुंच गए थे। कुछ इसी तरह की गलती पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई के दौरान की थी। उस भारतीय सेना ने पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था। इंदिरा गांधी ने बाद में सभी पाकिस्तानी सैनिकों को छोड़ दिया था। भाजपा के मुताबिक, भारत को आज तक उस गलती का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार ने जब 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने की घोषणा की तो कांग्रेस पार्टी ने सीधे तौर पर उसका समर्थन नहीं किया।
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भाजपा के चुनावी एजेंडे में दो मुद्दे सर्वोपरी रहे हैं। एक रामजन्म भूमि और दूसरा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति करना। मौजूदा समय में ये दोनों मुद्दे सुलझ चुके हैं। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेशों का दर्जा दे दिया गया है। भाजपा नेताओं के अनुसार, जम्मू कश्मीर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की नीति ढुलमुल रही थी। अगर वे इस मुद्दे पर गंभीरता से काम करते तो यह मामला दशकों पहले सुलझ गया होता। पाकिस्तानी कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के भरोसे का फायदा उठाकर 22 अक्टूबर, 1947 में पाकिस्तानी सेना को कबाईली लुटेरों के भेष में कश्मीर घाटी में धकेल दिया। सेना ने 'पाक अधिकृत कश्मीर' पर कब्जा कर लिया। इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू 31 दिसंबर, 1949 को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुंच गए। नतीजा, कश्मीर का मुद्दा अनसुलझा ही रह गया।


कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ भी एक बड़ा मौका आया था। 1971 की लड़ाई के दौरान जब पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसने का दुस्साहस दिखाया तो भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को पीछे धकेल दिया। इतना ही नहीं, भारतीय सेना के सामने पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश के रूप में एक नया देश अस्तित्व में आया। बाजी पूरी तरह से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में थी। पाकिस्तान को दोहरी चोट लगी थी। एक बांग्लादेश का बनना और दूसरा, उसके एक लाख सैनिक भारतीय सेना की गिरफ्त में होना।

आरएसएस के बड़े नेता इंद्रेश कुमार कहते हैं, वह समय भारत के लिए गोल्डन पीस की तरह था। इंदिरा गांधी, पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को छोड़ने के बदले में पाक अधिकृत कश्मीर को छुड़ा सकती थीं। उस वक्त पाकिस्तान, ना बोलने की स्थिति में नहीं था। वजह, उसके एक लाख सैनिक बंदी बना लिए गए थे। वही एक ऐसा समय था जब कश्मीर विवाद सदैव के लिए खत्म हो सकता था। वह मौका भारत के हाथ से निकल गया। इंदिरा गांधी ने बंदी बनाए गए सभी पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उसके बाद पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद का खूनी खेल शुरू कर दिया।

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