Hindi News ›   India News ›   Worry: How long will the Congress leave the ground for others, the leaders question, what will the party learn from these election results?

चिंता: कब तक दूसरों के लिए मैदान छोड़ेगी कांग्रेस, नेताओं का सवाल इन चुनाव परिणामों से क्या सीखेगी पार्टी?   

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sun, 02 May 2021 09:22 PM IST

सार

पांचों चुनावी राज्यों में कांग्रेस के लिए कहीं से भी अच्छी खबर नहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को चिंता होने लगी है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो अगले आम चुनाव में भाजपा से मुकाबले के लिए कैसे तैयार होगी पार्टी?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार

पांचों चुनावी राज्यों के रुझान अब परिणाम में तब्दील होने लगे हैं। भाजपा के लिए बंगाल का किला दूर भले ही रह गया हो, लेकिन तीन सीटों से उठकर वह राज्य की विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बनने में कामयाब हो गई है। असम-पुडुचेरी से भी उसके लिए बेहतर खबर है। टीएमसी के लिए इस चुनाव परिणाम से बेहतर खबर और कुछ हो नहीं सकती जहां भाजपा की प्रचंड ताकत के सामने ममता दीदी ने अपनी जड़ें न सिर्फ बरकरार रखी हैं, बल्कि लोगों को अचंभित करते हुए उसे एक नई गहराई तक पहुंचाया है। वहीं कांग्रेस के लिए कहीं से अच्छी खबर नहीं है। 



बंगाल में खाता भी नहीं खुला
इन्हीं चुनाव परिणामों के बीच कांग्रेस गायब दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस के लिए पांचों चुनावी राज्यों में कहीं से भी कोई सुखद खबर आती नहीं दिखाई पड़ रही है। बंगाल में तो कांग्रेस का खाता भी खुलता नहीं दिखाई पड़ रहा है। असम में पार्टी ने बड़ा दांव खेलने की कोशिश की थी, लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि उसकी यह कोशिश इस राज्य में भी कामयाब नहीं हो पाई है। केरल या तमिलनाडु में भी पार्टी यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि उसने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की है।


बंगाल से राहुल को दूर रहना सोची-समझी रणनीति थी
पार्टी की इन चुनाव परिणामों को लेकर जो रणनीति रही है, उसको लेकर कांग्रेस के अंदर ही विवाद होता रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जिस तरह खुद को बंगाल चुनावों से दूर रखा है, उसे लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत भाजपा को बंगाल की सत्ता से दूर रखने के लिए यहां का चुनाव पूरी तरह ममता बनर्जी के लिए छोड़ दिया था। दिल्ली में भी पार्टी पर यही आरोप लगे थे कि उसने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के लिए मैदान छोड़ दिया था।
 
यूपी, बिहार में हाशिये पर आई
लेकिन पार्टी के ही नेता मानते हैं कि अगर पार्टी इसी रणनीति पर चलती रही और दूसरों के लिए मैदान छोड़ती रही तो उसके अपने भविष्य का क्या होगा? इसी तरह की रणनीति को अपनाते हुए वह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बेहद महत्त्वपूर्ण राज्यों में हाशिये पर आ गई है। अगर वह इसी तरह की रणनीति पर चलती रही तो अगले आम चुनाव में वह भाजपा का  मुकाबला कैसे कर पाएगी?
 
हिंदूवादी राजनीति करे कांग्रेस : प्रमोद कृष्णम
प्रियंका गांधी वाड्रा के विशेष सलाहकार आचार्य प्रमोद कृष्णम मानते हैं कि भाजपा ने विशेष रणनीति के तहत कांग्रेस पर मुस्लिम परस्त होने का ठप्पा लगाया। वह काफी हद तक इसमें कामयाब भी हो गई क्योंकि कांग्रेस की अपनी गलतियों ने इस ठप्पे को दूर करने की बजाय और अधिक मजबूत करने का काम किया। पार्टी ने असम में बदरुद्दीन अजमल और बंगाल में मुस्लिम परस्त दल से गठबंधन कर भाजपा को बड़ा अवसर दे दिया। इसका पार्टी को बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा।

चंडीपाठ कर ममता ने मुस्लिम परस्त का ठप्पा नहीं लगने दिया
आचार्य प्रमोद कृष्णम के अनुसार भाजपा ने यही ठप्पा ममता बनर्जी पर भी लगाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने अपने चुनावी सभाओं में चंडीपाठ कर इस ठप्पे को अपने ऊपर लगने नहीं दिया। कांग्रेस को भी इसी तरह खुलकर हिंदूवादी राजनीति करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अब हिंदूवादी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहिए और पार्टी के ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाना चाहिए जो खांटी हिंदूवादी छवि को आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस तरह की राजनीति को बढ़ावा नहीं दिया गया तो आने वाले चुनावों में भी भाजपा का मुकाबला करना मुश्किल होगा।

रणनीति में सुधार जरूरी : सुष्मिता देव
कांग्रेस नेता सुष्मिता देव ने कहा कि पार्टी को अपनी रणनीति में सुधार की आवश्यकता है। पार्टी ने दर्जनों सीटें केवल दो-चार सौ वोटों के अंतर से गंवाई हैं। अगर इस सत्ता विरोधी लहर को भी हम अपने पक्ष में भुनाने में कामयाब नहीं हो सके हैं तो इसके लिए गहरे आत्ममंथन की आवश्यकता है। पार्टी को क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूती देने की रणनीति भी अपनानी चाहिए जो उसके लिए जमीनी आधार तैयार कर सकें।

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