शाह के जम्मू-कश्मीर की चाल तय: रॉ की सलाह पर जिन्हें केंद्र से मोटी राशि मिलती थी, उनकी दुकानें हुईं बंद

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 26 Oct 2021 01:53 PM IST

सार

अमित शाह ने सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने के लिए उनके साथ डिनर किया। पोस्ट पर गए और रात्रि विश्राम भी कैंप में किया। शाह ने कहा, सीआरपीएफ कैंप में जवानों के साथ एक रात बिताना चाहता हूं, आपके अनुभव और कठिनाइयों को जानना और जज्बे को देखना चाहता हूं। मेरे तीन दिन के दौरे का यह सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम है...
अर्धसैनिक बलों के जवानों के साथ भोजन करते अमित शाह
अर्धसैनिक बलों के जवानों के साथ भोजन करते अमित शाह - फोटो : Amit Shah/Twitter
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विस्तार

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की तीन दिवसीय जम्मू-कश्मीर यात्रा पूरी हो गई है। यात्रा के अंतिम पड़ाव में शाह ने पुलवामा के लेथपोरा में सीआरपीएफ कैंप में सैनिक सम्मेलन को संबोधित किया। इस यात्रा के दौरान अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर की 'चाल' तय कर दी है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में अपना संदेश दे दिया। वहां सब कुछ होगा, मगर चरणबद्ध तरीके से। फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती या गुलाम नबी आजाद कहते रहे हैं कि पहले जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दो, उसके बाद चुनाव कराओ। जम्मू कश्मीर के राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) का कहना है कि घाटी के कई ऐसे लोग, जिन्हें 70 साल में केंद्र से मोटी राशि मिलती रही है, वे शाह के दौरे से परेशान हो गए हैं। रॉ की सलाह पर दी जाने वाली राशि की दुकान अब बंद हो गई है। ऐसे लोगों ने देश के साथ धोखा किया है। वे लोग केंद्र से जम्मू-कश्मीर में हम सब ठीक करा देने की बात कह कर पैसा वसूलते रहे। दूसरी तरफ, उन्होंने आतंकवाद को कम करने की बजाए, उनके संगठनों को मदद देनी शुरू कर दी। वही लोग अब कह रहे हैं कि अनुच्छेद 370 की बहाली के बिना कश्मीर शांत नहीं होगा। शाह ने ऐसे लोगों को करारा जवाब दे दिया है कि जम्मू कश्मीर में पहले परिसीमन होगा, उसके बाद चुनाव होंगे, फिर पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा।
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अब घुटने टेके नहीं जाते, टिकवाए जाते हैं...

अमित शाह ने अपनी यात्रा के दौरान कहा, अब जम्मू कश्मीर में बहुत बड़ा कार्यक्रम शुरू हो रहा है। इसके तहत मंदिरों, गुरुद्वारों और इस्लामिक धार्मिक स्थलों सहित 75 सूफी धार्मिक स्थलों का सरकारी खर्चे से उन्नयन कर यहां एक बार फिर से गंगा-जमुनी तहजीब की शुरुआत की जा रही है। जो लोग यहां की शांति में खलल पहुंचाते रहे हैं, उनका मकसद है कि यहां उद्योग न लगें, युवा बेरोजगार रहे और बेरोजगार होकर उनके बताए रास्ते पर हाथ में पत्थर उठाता रहे। हम चाहते हैं कि युवा, हाथ में पत्थर की बजाय पुस्तक और कलम उठाए। हथियारों की जगह वह कलपुर्जे जोड़ने के साधन उठाए और अपने जीवन को संवारें।


कैप्टन अनिल गौर का कहना है, अब रॉ के माध्यम से कश्मीर के जिन लोगों को केंद्र से नियमित धन राशि मिलती थी, वह बंद हो गई है। इनमें राजनेता, अलगाववादी नेता और कुछ दूसरे संगठनों के पदाधिकारी शामिल हैं। अब इन लोगों को मालूम हो गया है कि केंद्र सरकार, पूर्व सरकारों की भांति इनके सामने घुटने नहीं टेकेगी, वह इनके घुटने टिकवा सकती है। अब केंद्र ने घाटी में किसी संगठन या प्रभावशाली लोगों के खातों में आने वाली राशि पर रोक लगा दी है। एक तरफ तो वे लोग सत्ता में नहीं रहे, दूसरा उनकी आमदनी का एक जरिया भी खत्म हो गया। वे तिलमिला रहे हैं।

'क्लोज्ड डोर मीटिंग' में शाह ने दिए आदेश

अमित शाह ने सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने के लिए उनके साथ डिनर किया। पोस्ट पर गए और रात्रि विश्राम भी कैंप में किया। शाह ने कहा, सीआरपीएफ कैंप में जवानों के साथ एक रात बिताना चाहता हूं, आपके अनुभव और कठिनाइयों को जानना और जज्बे को देखना चाहता हूं। मेरे तीन दिन के दौरे का यह सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। जब धारा 370 और 35ए हटाईं, तब कई अटकलें लगती थीं कि बहुत बड़ी प्रतिक्रिया आएगी, रक्तपात की भी आशंका थी, लेकिन आपकी मुस्तैदी के कारण किसी को एक गोली भी नहीं चलानी पड़ी। 2014 से 2021 तक नागरिकों की मौतों की संख्या 208 से 30 और सुरक्षाबलों के शहीद जवानों की संख्या 105 से घटकर 60 रह गई है, ये बताता है कि इस फ़ैसले को जम्मू-कश्मीर की अवाम ने भी स्वीकारा है।

कश्मीर में पत्थरबाजी आम थी, आज मामले ढूंढने पड़ रहे हैं। कैप्टन गौर के मुताबिक, शाह ने सुरक्षा बलों का हौसला तो बढ़ाया, लेकिन 'क्लोज्ड डोर मीटिंग' में एजेंसियों के प्रमुखों को ठीक से समझा भी दिया था। चाहे जैसे भी हो, आतंकियों के मददगार बने 'ओवर ग्राउंड वर्कर' को बाहर निकालो। आपके पास फोर्स है, दूसरे संसाधन हैं, अब तक तो आतंकियों के मददगार बाहर आ जाने चाहिए थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सिविलियन किलिंग मामले में करीब आठ सौ लोगों से पूछताछ की है। प्रत्यक्ष न सही, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर से उनमें से अनेक लोगों की रिपोर्ट संदिग्ध है।

सफेदपोश लोगों की पोल खुली

अमित शाह की यात्रा के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने बयान दिया कि कश्मीर के हालात सुधारने हैं तो अनुच्छेद 370 व 35ए को वापस करना होगा। इसके बिना शांति की बात करना बेकार है। उन्होंने पाकिस्तान से बात करने का पुराना राग दोबारा से अलाप दिया। महबूबा मुफ्ती भी इसी तरह की बयानबाजी करती रहीं। इन नेताओं ने कहा, केंद्र बिना किसी शर्त के जम्मू-कश्मीर को उसका पूर्ण राज्य का दर्जा वापस करे। अमित शाह ने इन लोगों को करारा जवाब दे दिया है। गृह मंत्री ने कहा कि फारूक अब्दुल्ला ने मुझे सलाह दी है कि भारत सरकार पाकिस्तान से बात करे, लेकिन मैंने कह दिया कि मैं तो घाटी के अपने भाई-बहनों और युवाओं से बात करूंगा। शाह ने यह बयान इसलिए दिया कि घाटी में सफेदपोश लोगों की पोल खुल चुकी है। आतंकियों से जुड़े मामलों में एनआईए और ईडी की चार्जशीट देंखे तो पता चलता है कि ये लोग चेहरे पर नकाब रखकर पाकिस्तान और आतंकियों के हिमायती बने हुए थे। इनके अपने बच्चे विदेश में पढ़ते हैं और ये लोग घाटी के युवाओं को हथियार व पत्थर थमाते रहे हैं। अब गुपकार समूह के नेताओं को जवाब मिल चुका है। बतौर कैप्टन गौर, दिल्ली की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनेगी। शाह ने भी यही इशारा किया है कि पहले परिसीमन होगा और उसके बाद चुनाव। पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात भी केंद्रीय गृह मंत्री ने कही है।

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