मीरः पहला सुख़नवर जिससे मेरा साबका पड़ा

A memorable write up on mir taki mir and delhi
                
                                                             
                            
दिल्ली अब महज़ एक शहर नहीं रह गया है। बरतानिया राज के ख़ात्मे के बाद से नई सल्तनतों में तकसीम होता रहा, शिखर राजनीति के रजवाड़ों में धंसा रोज़ चेहरे बदलता, एक अफ़लातून महानगर है। उसमें विभाजन के बाद से गंवई-शहरी अनेक दिल्लियां और ज़ुबानें आन बसी हैं।

विभाजन के आस-पास की पैदाइश के समय से हम उसी बंद मुठ्ठी वाली 'देहली' के बाशिंदे हैं, जिसकी संस्कृति को सबसे ज़्यादा यहां के और फिर पूरे हिंदुस्तान के होकर रहे 'मीर' 'मोमिन' 'ग़ालिब' 'ज़ौक़' जैसे आलमगीर फ़क़ीराना तबीयत के शायरों ने सिरज़ा और प्रभावित किया है।

उन सुख़नवरों में क़ुदरतन मेरा साबका सबसे पहले  'मीर' की शायरी, मसनवी, कत'आ और फिर नज़्मों(बारम्बार) से पड़ा। पहली सूरत में वजह रही पतंगबाज़ी !! हवा की छुअन के बाद लहरते और पैंतरे बदलते कागज़ के इन परिन्दों (पतंगों) पर आशिक़ मिज़ाज पतंगबाज़ दोयम दर्जे के या 'ग़ालिब', 'मीर', 'दाग़', 'फ़िराक़' के शेर भी टांग दिया करते थे। पतंगों की लूट और संग्रह रुचि उन दिनों बुलंदी पर थी। एक रोज़ 'चांदतारा' बग़ल के घर की मुंडेर पर आन गिरा और मांजा-सद्दी हमारी मुंडेर को छू रही थी। कटी हुई की डोर खैंचते ही वह पतंग भी नसीब हुई। उस पर एक शेर खुदा था...

            मर जाऊं कोई परवाह नहीं है
             कितना मग़रूर है अल्लाह अल्लाह


अल्हड़पन की उम्र थी। इतना समझ आ रहा था - यह  "किसी ने किसी को" दरयाफ़्त किया है। पर शेर किस का है? मालूम किया तो बाद में जान पड़ा यह देहली, आगरा और लखनऊ में (किसी सूरत) रहगुज़र करते रहे - ख़ुदा-ए-सुखन 'मीर' साहब का है। उसमें तरमीम यही थी कि 'मर जाओ' को ख़ुद के लिए 'मर जाऊं' और परवा को 'परवाह' लिखा गया था। ख़ैर...फिर तो इन 'गुड्डियों' पर हर साल पंद्रह अगस्त के आस-पास जाने कितने शेर अज्ञात-महबूबाओं पर न्यौछावर होते रहने की सनद मिलती चलीं गई।

कॉप, कन्नी, ठुड्डी, ऊपरी तुक्का और नीचे का पत्ता लगाने वाले हम उम्र 'उस्ताद छोकरे' आस-पास रहते थे। पर उनकी रुचि (मेरी तरह) शायरी के औसारे में बेवजह छलांग लगाने में कतई न थी। और मैं 'चंग' 'तिरंगे', 'चांदतारा', 'तुक्कल' से 'दमड़-चील' तथा 'अध्दे' तक पर ख़ुदे शेरों तक की फ़िराक़ में रहने लगा था। बसंत पंचमी, जन्माष्टमी और मकर-संक्रांति को भी कनकव्वों से ढपे (ढके) अपने सदर बाज़ार इलाके के आसमां को तेलीवाड़े से ताका करता था। जिसको जो चाहिए था मिल जाता था। पतंगों पर रचे शेरों की सूरत मेरी मुलाक़ात इन मफ़्तने (मोहित करने वाले) शेरों की मार्फ़त उस्ताद शायरों से हुई और होती चली गई...!!

पतंगबाज़ी पुराने वक़्तों में सलीमगढ़ में होती रही होगी। हमारे वक़्तों में पुर-पैच (बड़े दांव) (5 से 100-500 रुपये तक) लालक़िला, जुम्मा मस्जिद, रौशनारा बाग़ के खुले दामन में लड़ाए गए। मेरा शौक़ मुंडेरों तक था  वह भी लूटने में ज़्यादा। बस फिर वह भी छूटने लगा - जब 'लूट' में मिले ये उम्दा, घटिया या रसिकपन की ठसक से उपजे 'शेर' भीतर ज़्यादा उड़ान भरने लगे। शाइरी शगल बना गया और शायर रंग अफ़्शां (नये-नये रंग अनुभूतियों को फुलाने और रचने वाला)! 'मीर' साहब के कलाम के ऊंचे टीले पर खड़े होने से पहले चंद ऐसे शेरों से भी वास्ता पड़ा जो उन जैसी ही अहलीयत याफ़्ता अर्श पर बैठे (बड़े) दूसरे शायरों का कलाम था। मुलाहज़ा ज़रूर फ़रमाएं ...
 
     "रात भी, नींद भी, कहानी भई ... 
  हाय क्या चीज़ है जवानी भी।"  - फ़िराक़
                                                                                                  
 "दिल के बहलने की तदबीर तो है 
 तू, नहीं है, तेरी तस्वीर तो है।"
                                                                                                   
 "मेरी क़िस्मत के दे के बल इनमें
 किसने गेसू, तेरे संवारे हैं।"     - कुं.महिंदर सिंह बेदी
                                                                                                    
   "बला-ए-जां है 'ग़ालिब' उसकी हर बात
 इबारत क्या, इशारत क्या, अदा क्या।"
                                                                                                   
लेकिन ऐसी ही तबीयत से सराबोर टपका एक और शेर 'मीर' साहब का भी, एक पतंग पर चस्पा फिर पढ़ने को मिला 

  "क्या चाल यह निकाली हो कर जवान तुमने
अब जब चलो हो, दिल को ठोकर लगा करे है!!"
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"मेरे रोने की हक़ीक़त जिसमें थी, एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा।"

2 years ago
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