नसीर : एक ईमानदार कोशिश

Naseer: An honest effort
                
                                                             
                            
 
आत्मकथा लोग चाव से पढ़ते हैं, खासकर फ़िल्म संसार से जुड़े लोगों की आत्मकथा पाठक को आकर्षित करती है। अक्सर फ़िल्मी लोग अपनी कहानी ‘घोस्ट राइटर’ से लिखवाते हैं। जरा-सी चूक से आत्मकथा आत्मश्लाघा के गर्त में डूब सकती है। एक सर्वोत्तम अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अपने जन्म, बचपन तथा 32 वर्ष की अपनी उम्र का ईमानदार लेखा-जोखा ‘एंड दैन वन डे’ में देते हैं। नसीरुद्दीन शाह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। कलात्मक सिनेमा और लोकप्रिय सिनेमा दोनों में उनकी उपस्थिति की सराहना होती रही है। बड़े परदे पर जितने वे सफ़ल रहे हैं उतने ही सफ़ल वे छोटे परदे पर भी रहे हैं। दूरदर्शन पर उनके निभाए किरदार ‘गालिब’ को कौन भूल सकता है। आज भी गालिब के नाम पर आँखों के सामने उन्हीं का अक्श उभरता है। फ़िल्में चाहे वो ‘निशांत’ हो अथवा ‘चमत्कार’ या फ़िर ‘हीरो हीरालाल’ या ‘मंडी’ हो चाहे हो ‘मासूम’ उन्होंने सब पर अपनी छाप छोड़ी है। ‘मासूम’ के बाद जब  दर्शक ‘सरफ़रोश’ देखता है तो वह शिद्दत से चाहता है कि गुलफ़ाम हसन बकरी का कान न उखाड़े मगर क्रूरता की हद का अभिनय नसीर उसी बड़ी सहजता से करते हैं जिस सहजता से ‘मिर्च मसाला’ के लीचड़ किरदार का। वे गंभीर भूमिका में जितने जँचते हैं हास्य और हल्की-फ़ुल्की भूमिकाओं में भी उतने ही प्यारे लगते हैं।
 
फ़िर भी उनकी आत्मकथा पढ़ने की उत्सुकता थी। इसलिए जब उनकी आत्मकथा ‘एंड दैन वन डे’ हाथ लगी तो एक बार में पूरी पढ़ गई। जमींदार परिवार से आने वाले नसीर अपने पिता, मामाओं, स्कूल-कॉलेज टीचर्स, नेशनल ड्रामा स्कूल, पूना फ़िल्म संस्थान के साथियों-शिक्षकों की विशेषताओं-कमियों को दिखाते, अपनी कमजोरियों को खोल कर लिखते हैं। जीवन का बड़ा हिस्सा मेरठ के सरधना में बीता, जो उनका ननिहाल है। इस किताब से नाटक के उनके जुनून का पता चलता है और फ़िल्मी परदे पर खुद को देखने की ख्वाहिश का भी। बेबाकी से नशाखोरी, अपने पहले विवाह और उसके टूटने तथा अपनी पहली संतान हीबा से कई वर्षों तक न जुड़ पाने, मिलने पर पुन:संबंध स्थापित करने में होने वाली हिचक का वर्णन करते हैं।
 
नसीर बड़े अभिनेता हैं, वे नाटक और फ़िल्म दोनों से जुड़े हैं। उनकी आवाज उनकी पहचान है साथ ही उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए भाषा पर उनके अधिकार से आप रू-ब-रू होते हैं। पूरी किताब कहानी का मजा देती है उनके चरित्र चित्रण और घटना वर्णन उनके लेखन की शक्ति का नमूना हैं। यदि वे अभिनेता न बन कर लेखक बनते तो भी सफ़ल होते मगर इतने भी नहीं। अभिनय उनका ‘स्व-धर्म; है।
 
2002 में उन्हें एक बार काफ़ी पैसे मिले और बहुत ऊबे हुए थे तो उन्होंने एक लैपटॉप खरीदा और एक आदमी रख कर उसे चलाना सीखा। मालूम नहीं था कि इस मशीन का क्या करें तो बस लिखने लगे, ‘मैं पैदा...’ और नतीजा हुई यह किताब ‘एंड दैन वन डे’। मेरा मानना है कि यह ‘घोस्ट राइटिंग’ नहीं है। साढ़े तीन सौ पन्नों में अपने जीवन के पहले 32 वर्षों को खूबसूरती से पिरोते हैं। रत्ना पाठक से अपनी शादी तक के समय को दर्ज करते हैं। नसीर के अनुसार रत्ना के आने से उनकी जिंदगी थोड़ी पटरी पर आई है। इस किताब में उनके और उनके परिवार के खूब सारे चित्र भी संलग्न हैं।
 
अपने जिद्दीपन को रेखांकित करते हुए नसीर सहकर्मियों ओम पुरी, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल की अभिनय क्षमता की प्रशंसा करते हैं, खासकर दिलीप कुमार और ओम पुरी के अभिनय की तारीफ करते हैं। पीटर ब्रुक जैसे नाट्य-फ़िल्म निर्देशक की असलियत खोलते हैं। वे विभिन्न निर्देशकों और उनके साथ अपने संबंधों का बड़ा बेबाक खुलासा करते हैं। इनमें प्रमुख हैं, इब्राहिम अलकाज़ी, श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, सई परांजपे, शेखर कपूर, गुलजार। इन निर्देशकों की जम कर तारीफ़ करते हैं। वे अपने प्रेम संबंधों और नशे की बात भी बिना झिझक लिखते हैं। कई जगह अपना खुद का मजाक उड़ाते हैं। नसीर जीवन में आई स्त्रियों – अपनी अम्मी, दूसरी पत्नी रत्ना पाठक को अपनी कामयाबी का श्रेय देते हैं। हिन्दी मसाला फ़िल्मों में काम की चाहत न रखने वाले नसीर की आत्मकथा ‘एंड दैन वन डे’ पढ़ते हुए आप बाराबंकी से मुंबई (बंबई) तक की विशिष्ट व रोचक यात्रा करते हैं। और आप जानते हैं कि नसीर कौन हैं, वे ऐसे क्यों हैं।
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6 months ago

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