संपन्न हुआ होली स्पेशल काव्य कैफ़े का एपिसोड

kavya cafe episode on holi
                
                                                             
                            काव्य कैफ़े का होली स्पेशल एपिसोड शनिवार शाम संपन्न हुआ। इसमें कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से रंग बिखेरे। कार्यक्रम लगभग एक घंटे तक चला जिसका प्रसारण हमारे फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल पर लाइव किया गया। महफ़िल में हास्य से लेकर श्रृंगार तक सभी रस होली पर देखने-सुनने को मिले। 
                                                                     
                            



सबसे पहले अनिल शर्मा ने गीत के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी

रंग बिखरे हैं दिल मिलाने के लिए
दिल का हर दर्द रंगों में भुलाने के लिए
फूल टेसू के खिले हैं फ़ज़ा में देखो 
ख़ुश्बू उट्ठी है होश उड़ाने के लिए

कृष्ण ने रंग भरी बांसुरी धुन छेड़ी है
उड़ा गुलाल है बादलों को रिझाने के लिए
दिल का हर दर्द है रंगों में भुलाने के लिए 

भूल जाना ही मुनासिब है कमियों को
रंग बरसाइए भीगने भिगाने के लिए
दिल का हर दर्द रंगों में भुलाने के लिए

इसके बाद झांसी से हमारे साथ वैभव दुबे जुड़े जिन्होंने मुक्तक पढ़ा कि

नाच- गाना तेज़ बोली का मज़ा कुछ और है
मस्तियां कुछ कम नहीं होती हैं सब के साथ पर
दोस्तों के साथ होली की मज़ा कुछ और है

फिर उन्होंने गीत गाया 
दिल से दिल यूं मिल गए धड़कन रंगोली हो गयी

कवयित्री निधि सिंह ने पढ़ा कि

देखो किस्सा है छुपा कोई नया होली में
उनको एक दूजे से अब प्यार हुआ अब होली में
खिल से जाते हैं ये बिखरे हुए सारे रिश्ते
भूल कर सारा ही शिकवा ओ गिला होली में

कृष्ण ने प्रीत की हर रीत ही बदल डाली
देख के राधा को दीवाना बना होली में
रंग को डार के कोरी ये चुनर रंग डारी
यूं भी उल्फ़त का नया जश्न मना होली में

तोयेश भाटिया जो पेशे से भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं उन्होंने हास्य कविता प्रस्तुत की कि

काहे को करनी होली की कुछ तैयारी
त्योहार नहीं ये है सबसे बड़ी बीमारी
पिछली बार रंगों से ऐसा मुझे सरोबार कर दिया
कि घरवालों तक ने पहचानने से इंकार कर दिया 

पूनम सोनछात्रा जो गणित की शिक्षिका हैं, उन्होंने पढ़ा कि

रंगों में ख़ुदा आज दिखा, रंग मुबारक़
होली है मेरे दोस्त सुना, रंग मुबारक

फैला है धनक में तो फूलों में भी बिखरा
जैसे कि ख़ुदा ने कहा हो, रंग मुबारक़

अगले मेहमान थे सूरज मणि, जो बनारस से हमारे साथ जुड़े

ज़्यादा ऊंचे उठोगे, तो ढह जाओगे
रेत जैसे बिखरके ही रह जाओगे
मुझको रोने से गर तुमने रोका नहीं
मेरे आंसू की धारा में बह जाओगे

अब संभाला नहीं हमसे दिल जाएगा
शाख पर फूल कोई जो खिल जाएगा
सारी दुनिया लगेगी मुझे स्वर्ग सी
जो हमारा है जब हमको मिल जाएगा
2 months ago
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