यह है अकबर अलाहाबादी का हास्य-रस...

Akbar Allahabadi humorous poetry
                
                                                             
                            ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’
                                                                     
                            
जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन

तंग इस दुनिया से दिल दौरे-फ़लक़ में आ गया
जिस जगह मैंने बनाया घर, सड़क में आ गया

पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया
‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया

बोला चपरासी जो मैं पहुँचा ब-उम्मीदे-सलाम
"फाँकिये ख़ाक़ आप भी साहब हवा खाने गये"

दिल में अब नूरे-ख़ुदा के दिन गए
हड्डियों में फॉसफ़ोरस देखिए 

क़द्रदानों की तबीयत का अजब रंग है आज
बुलबुलों को ये हसरत, कि वो उल्लू न हुए

ख़ुदा की राह में बेशर्त करते थे सफ़र पहले
मगर अब पूछते हैं रेलवे इसमें कहाँ तक है?

नौकरों पर जो गुज़रती है, मुझे मालूम है
बस करम कीजे मुझे बेकार रहने दीजिये


साभार- कविताकोश
2 months ago

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