चांद क्यूं अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था - गुलज़ार

gulzar nazm chand kyun abra ki us maili si gathri mein chhupa tha
                
                                                             
                            

चांद क्यूं अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था
उस के छुपते ही अंधेरों के निकल आए थे नाख़ुन
और जंगल से गुज़रते हुए मासूम मुसाफ़िर
अपने चेहरों को खरोंचों से बचाने के लिए चीख़ पड़े थे

चांद क्यूं अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था
उस के छुपते ही उतर आए थे शाख़ों से लटकते हुए
आसेब थे जितने
और जंगल से गुज़रते हुए रहगीरों ने गर्दन में उतरते
हुए दांतों से सुना था
पार जाना है तो पीने को लहू देना पड़ेगा

चांद क्यूं अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था
ख़ून से लुथड़ी हुई रात के रहगीरों ने दो ज़ानू प गिर कर,
''रौशनी, रौशनी''! चिल्लाया था, देखा था फ़लक की जानिब,
चांद ने गठरी से एक हाथ निकाला था, दिखाया था चमकता हुआ ख़ंजर

2 months ago
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