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Harivansh Rai Bachchan: यह वर्षा ॠतु की संध्या है, मैं बरामदे में कुर्सी पर घिरा अँधेरे से बैठा हूँ

harivansh rai bachchan hindi kavita yah varsha ritu ki sandhya hai
                
                                                                                 
                            

यह वर्षा ॠतु की संध्या है,


मैं बरामदे में कुर्सी पर
घिरा अँधेरे से बैठा हूँ
बँगले से स्विच आँफ़ सभी कर,
उठे आज परवाने इतने
कुछ प्रकाश में करना दुष्कर,
नहीं कहीं जा भी सकता हूँ
होती बूँदा-बाँदी बाहर।

उधर कोठरी है नौकर की
एक दीप उसमें बलता है,
सभी ओर से उसमें आकर
परवानों का दल जलता है,
ज्योति दिखाता ज्वाला देता
दीया पतंगों को छलता है,
नहीं पतंगों का दीपक के
ऊपर कोई वश चलता है।

है दिमाग़ में चक्कर करती
एक फ़ारसी की रूबाई,
शायद यह इकबाल-रचित है
किसी मित्र ने कभी सुनाई;
मेरे मनोभाव की इसके
अंदर है कुछ-कुछ परछाई।

’दिल दीवाना, दिल परवाना,
तज दीपक लौ पर मंडराना,
कब सीखेगा पाँव बढ़ाना
उस पथ पर जो है मर्दाना।
ज्वाला है खुद तेरे अंदर,
जलना उसमें सीख निरंतर,
उस ज्वाला में जल क्या पाना
जो बेगाना, जो बेगाना।’

1 month ago

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