अगर धीरे चलो वह तुम्हे छू लेगी दौड़ो तो छूट जाएगी नदी: केदारनाथ सिंह

अगर धीरे चलो वह तुम्हे छू लेगी दौड़ो तो छूट जाएगी नदी: केदारनाथ सिंह
                
                                                             
                            कवि केदारनाथ सिंह की "नदी" कविता उनके प्रसिद्ध संग्रह "अकाल में सारस" से ली गई है। "नदी" वास्तव में अपनी लय में बहती हुई जल की धारा भर नहीं है, वह हमारा जीवन है, प्राणदायिनी है, सांस्कृतिक धरोहर है, हमारी सभ्यता 'नदी' की देन है। इस कविता में "नदी" को उसके बड़े कैनवास पर समझने की कोशिश है।
                                                                     
                            

अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
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1 month ago

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