एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों : दुष्यंत कुमार एक परिवर्तनकामी रचनाकर

दुष्यंत कुमार
                
                                                             
                            [यह लेख वर्धा से प्रो. सेवाराम त्रिपाठी ने लिखा है।]
                                                                     
                            

"तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है 
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा 
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में 
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा 
यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं 
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा" 


यूँ तो जनता की कविता की जब भी हम बात करते हैं तो हमारे सामने वह कविता अवश्य होती है जो जनता के सुख-दुख में उसके संघर्षों में, उसके जीवन संग्राम में हमेशा साथ होती है। आज़ादी के बाद की जनपक्षधरताओं और जनसंघर्षों की कविता में नागार्जुन, रघुवीर सहाय, रमेश रंजक, गोरख पाण्डे, मुकुट बिहारी सरोज जैसे कई कवि हैं।

ऐसे जनपक्षधर कवियों में शलभ श्रीराम सिंह और दुष्यंत कुमार भी शामिल हैं। दुष्यन्त कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर के राजपुर नवादा में एक सितम्बर 1933 को हुआ और निधन भोपाल में 30 दिसम्बर 1975 को हुआ था। दुष्यंत कुमार की शख़्सियत पर बात करने से पहले हमें हस्तक्षेप और प्रतिरोध के बारे में भी जानना ज़रूरी है।

हस्तक्षेप और प्रतिरोध ये दो ऐसे शब्द हैं जिनसे रचनाकार के व्यापक सरोकारों का पता चलता है। यह भी ज्ञात होता है कि उसके सामाजिक ’कन्सर्न’ क्या हैं और किस तरह के हैं। हस्तक्षेप मतलब दूसरे के काम में हाथ डालना।

कोई भी रचनाकार सत्ता, व्यवस्था या किसी की मनमानी के ख़िलाफ़ जब सामान्य कार्यवाही करता है तो हम उसे हस्तक्षेप कह सकते हैं, लेकिन जब यह कार्यवाही व्यापक स्तर पर विरोध के रूप में या परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में बड़े व्यापक पैमाने पर की जाती है, तब उसे हस्तक्षेप नहीं प्रतिरोध ही कहा जाता है।  आगे पढ़ें

4 months ago

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