इब्ने इंशा की शायरी में मीर की रवानगी तो नज़ीर की फ़क़ीरी भी है...

इब्ने इंशा की शायरी में मीर की रवानगी तो नज़ीर की फ़क़ीरी भी है...
                
                                                             
                            सौंदर्य के प्रति आशिकी और आकर्षण से भी शायरी बनती है लेकिन सुंदरता और जीवन दर्शन के संयोग से जो कविता पैदा हो, वह हर समय में न केवल मौज़ूं रहेगी बल्कि अपने नए अर्थ भी खोलती रहेगी। इब्ने इंशा उर्दू के ऐसे ही शायर थे, जो सौंदर्य को जीवन के मर्म के साथ मिलाकर देखते थे। 'इंशा' ने शायरी के प्रचलित तौर-तरीकों से अलग अपनी रचनाओं के लिए एक नया सौंदर्य-बोध ईजाद किया। हिंदी साहित्य में जो धारा कबीर या नागार्जुन की थी उर्दू में वही धारा इब्ने इंशा की रही।
                                                                     
                            

शहरों में फिरे सन्यास लिए, जनता को जगत् भगवान कहे 
इंशा सा कोई रमता देखा ? कहने को हैं जोगी बन में 

किस वास्ते ठेठ बने रहिए, ज़रा रंग बदल के ग़ज़ल कहिए 
ये जो उर्दू ज़बान हमारी है, सौ रंग हैं इसके दामन में 

उस हुस्न के नाम पे याद आए सब मंज़र 'फ़ैज' की नज़्मों के
वहीं रंगे-हिना वही बंदे-कबा वही फूल खिले पैराहन के 
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2 years ago

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