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कर्म मंथन

                
                                                                                 
                            जीवन-रत्नाकर में अनगिनत गोते लगाने है,
                                                                                                

कुछ जाने, कुछ अनजानें है,
हर बार न मिलता मोती इसमें,
हर सीप के अपने अफ़साने है ।

न छांव का ठिकाना है,
तन्मयता से पांव जमाना है,
भंवर-समर से निकल,
सुखद-साहिल पाना है ।

उजली किरण से जो हौसला पाया,
प्रबल-प्रलय से प्राण बचाया,
उम्मीदों की नाव से,
दुरूह काल को सजीला बनाया ।

अति शीघ्र न हारे मन,
अशुद्ध विकृतियों का हो दमन,
दिखती राहें एक-सी सब,
सुकर्म-कुकर्म का करना है मनन ।

नीरस-बयार में रस-सुधा का घोल दो,
उदासी-लहर में हँसी के बोल बोल दो,
अतीत के पीर से न हो! अब अधीर,
मंजूषा-मर्म को कर्म-कुंजी से खोल दो ।

- हर्ष शर्मा
सीकर, राजस्थान
 
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1 month ago

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