ख़ुदा

                
                                                             
                            कितनी मजबूरी सनम ये दिल अंदर दबाये बैठा है, न जाने किस मंजर पर ये नज़रे लगाए बैठा है,
                                                                     
                            
इल्म तो इसे भी है हर ख्वाब अधूरा रह जाने का फिर भी, न जाने कौन सी फिकर में कम्बखत सांसे लुटाये बैठा है....

न जाने किन किन तकलीफों से वास्ता है इसका, हर दर्द को ये पलको पे सजाये बैठा है, बहुत ही जिद्दी है ये समझता ही नहीं , अपने ही टुकड़े देख क्या खूब मुस्कुराये बैठा है...

करके गुनाह ए इश्क़ बड़े ही शान से ये दिल, नगमें महोब्बत के गुनगुनाये बैठा है, मालूम नहीं इसको ज़माना कितना मतलबी है यहाँ, और ये है कि अपने ही क़ातिल को अपना ख़ुदा बनाये बैठा है....



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2 years ago

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