मन की हलचल

                
                                                             
                            नफरत सी हो गई है अब मुझे मेरे ही किरदार से
                                                                     
                            
हार सी गई हूं बस आज अपने ही आप से
बात यह नहीं है कि जवाब मेरे पास नहीं है
पर डरती हूं रिश्तो में तकरार से
नहीं चाहती मैं की झुके कोई मेरे सामने,
बस मैं कभी हो जाऊं उदास तो हँसाये मुझे भी कोई किसी बहाने से
रिश्तो की तकरार ना जाने क्यों मुझे तोड़ सी जाती है
अपने हो या पराए मैं कुछ बोलूं तो मुख मोड़ ही जाते हैं
हृदयों को जोड़ने की कोशिश में करती ही रहती हूं
न जाने मेरी कौन सी गलती से रिश्ते चटक ही जाते हैं
आज भी उम्मीदों के सपने न जाने क्यो मुझसे ही सबने बुन रखे हैं
जब सबके दिल हमने ही तोड़ रखे हैं,
रिश्तों की बगावत में, मैं पीस जाती हूं।
कभी मिर्जा कभी धनिया तो कभी हल्दी बन जाती हूं।।

- रंजना शुक्ला
 
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2 months ago

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