“मिर्ज़ा ग़ालिब तो फ़ैज़ से भी ख़राब पढ़ते थे...” एक मज़ेदार शाम का वाक़या

Ghalib chhuti sharab: Faiz ahmed faiz in allahabad
                
                                                             
                            

यह वाक़या किताब ‘ग़ालिब छुटी शराब’ में लिखा हुआ है। रवीन्द्र कालिया ने संस्मरण के तौर पर इस किताब को लिखा है। अपने समय की अनेक साहित्यिक हस्तियों के क़िस्से इसमें दर्ज किए गए हैं। उन्हीं में से एक यह क़िस्सा मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के नाम है।  

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इलाहाबाद आए हुए थे। सन् 1981 के अप्रैल महीने के आख़िरी हफ़्ते की वह ऐतिहासिक शाम विभूति के घर पर फ़ैज़ के नाम दर्ज हो गयी। हिंदी-उर्दू के लेखकों, शायरों, रंगकर्मियों और संस्कृतकर्मियों को फ़ैज़ के सान्निध्य का मतलब समझ आया। लग रहा था कि कई युगों और समुद्रों के पार से अपनी बिरादरी का कोई खोया हुआ सिद्धार्थ घर लौट आया है।

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2 weeks ago
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