जब नामवर सिंह ने अपने गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी से पूछा- सबसे बड़ा दुख क्या है

Namvar singh with hazari prasad dwivedi
                
                                                             
                            

नामवर सिंह साहित्य के उत्तुंग शिखर पर बैठे हुए विरले नामों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य और आलोचना को नए आयाम दिए हैं। उनके निधन से संपूर्ण साहित्य-संसार शोक में है। 

नामवर सिंह अपने बारे में कहा करते थे कि, "कहने को तो मैं भी प्रेमचंद की तरह कह सकता हूं कि मेरा जीवन सरल सपाट है। उसमें न ऊंचे पहाड़ हैं, न घाटियां हैं। वह समतल मैदान है। लेकिन औरों की तरह मैं भी जानता हूं कि प्रेमचंद का जीवन सरल सपाट नहीं था। अपने जीवन के बारे में भी मैं नहीं कह सकता कि यह सरल सपाट है। भले ही इसमें बड़े ऊंचे पहाड़ न हों, बड़ी गहरी घाटियां न हों। मैंने जिन्दगी में बहुत जोखिम न उठाए हों, लेकिन जीवन सपाट न रहा।

मैंने कभी अपने गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी से पूछा था, ‘सबसे बड़ा दुख क्या है?’ बोले, ‘न समझा जाना।’
मैंने फिर पूछा, सबसे बड़ा सुख? वह बोले, ‘ठीक उलटा! समझा जाना।’ इसी समझा जाना और न समझ में आना पर मेरी जिंदगी टिकी रही। 

नामवर सिंह हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्यों में से एक थे। 

1 week ago

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