कठिन समय में सत्य की सबसे अधिक ज़रूरत है - रवीन्द्रनाथ टैगोर

Rabindranath tagore thoughts on life
                
                                                             
                            जल में जब तरंगे उठती हैं, तब प्रतिबिंब अपने आप विकृत हो जाता है। इसके लिए किसी और को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भीषण भय एवं भावनाओं के चरम मुहूर्त में हमारी चिंता और बातचीत में सहज ही विचलन आ जाता है, जबकि चुनौतियों के ऐसे समय में ही हमारे लिए अविचलित एवं निर्विकार सत्य को आवश्यकता सबसे अधिक होती है। रोज-रोज के झूठ और अर्द्धसत्य से बेशक हमारा उतना अनिष्ट न होता हो, लेकिन निश्चित तौर पर जानिए कि संकट के दौर में हमारे लिए इनसे बड़ा शत्रु और कोई नहीं है।
                                                                     
                            

इसलिए मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आज हम भय में, क्रोध में, आकस्मिक विपत्ति में, दुर्बल चित्त के अतिशय आक्षेप से आत्मविस्मृत होकर सिर्फ़ कुछ व्यर्थ वाक्यों की धूल उड़ाकर हमारे चारों ओर के धुंधले आकाश को और अस्वच्छ न करें। वास्तविकता यह है कि कई बार कुछ बेहद आक्रामक वाक्यों से हमारे चित्त की चंचलता बढ़ जाती है और भय के ज़रिये सत्य को किसी तरह छिपा देने की ख़तरनाक प्रवृत्ति पैदा होती है। इसलिए आज के दिन अगर हम अपने ह्रदय के आवेग को सामने लाने की उत्तेजना को रोककर, शांत चित्त से वर्तमान घटनाओं पर विचार न करें, तो हमारी आलोचना न केवल व्यर्थ सिद्ध होगी, बल्कि उससे भीषण अनिष्ट भी होगा। आगे पढ़ें

5 months ago

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