तो इक़बाल की इस ग़ज़ल से अब्दुल हई बन गए साहिर लुधियानवी

Sahir ludhianvi takhallus from Iqbal ghazal
                
                                                             
                            उन दिनों अब्दुल हई अपना तख़ल्लुस तलाश कर रहे थे। तख़ल्लुस उसे कहते हैं जिसे शायर अपने नाम के तौर पर ग़ज़लों में इस्तेमाल करते हैं। बात सन् 1937 की है जब अब्दुल की परीक्षाएं चल रही थीं। तभी अपनी किताब पलटते हुए उन्हें मशहूर शायर मोहम्मद इक़बाल की ग़ज़ल दिखाई दी। उस ग़ज़ल को ख़ास तौर पर दाग़ देहलवी के लिए लिखा गया था। जो कुछ यूं थी कि
                                                                     
                            

चल बसा दाग़ आह, मय्यत उसका ज़ेब-ए-दोश है
आख़िरी शायर जहानाबाद का ख़ामोश है

इस चमन में होंगे पैदा बुलबुले शिराज़ भी
सैंकड़ों साहिर भी होंगे, साहिब-ए-इजाज़ भी

हू-ब-बू खींचेगा लेकिन इश्क़ की तस्वीर कौन
उठ गया नावक फ़गन, मारेगा दिल पर तीर कौन

इसके दूसरे शेर में साहिर लफ़्ज़ आता है। साहिर का मतलब है जादूगर - मैजिशियन। इक़बाल ने इस ग़ज़ल में कहा है कि ऐसे सैंकड़ों शब्दों के जादूलर आएंगे लेकिन दाग़ जैसा कोई न होगा। इसे पढ़कर अब्दुल हई को लगा कि वह भी - वह भी बाक़ी के सैंकड़ों कवियों में से एक ही तो हैं इसलिए उन्होंने इसी शब्द को अपना तख़ल्लुस बना लिया। चूंकि वह लुधियाना से थे इसलिए अपने शहर का नाम ख़ुद से जोड़ते हुए वह साहिर लुधियानवी हो गए। हालांकि, वक़्त ने बताया कि साहिर वाक़ई लफ़्ज़ों के जादूगर निकले और दूसरों से अलग भी।
5 months ago

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