यह मिथ है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं: नरेन्द्र कोहली

यह मिथ है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं: नरेन्द्र कोहली
                
                                                             
                            व्यंग्य,नाटक, उपन्यास व कहानी हर विधा में नरेन्द्र कोहली को कौन नहीं जानता। उनके लाखों पाठक देश विदेश में बिखरे हैं। उनके उपन्यासों की लंबी श्रृंखलाएं हैं। चाहे 'महासमर' हो, 'अभ्युदय' हो या 'तोड़ो कारा तोड़ो'--इनके कई कई खंड लिख कर उन्होंने जो लोकप्रियता पाई है वह हिंदी में उनके समकालीनों से शायद ही किसी को सुलभ हो। उनके लेखन पर भले ही अतीतजीवी या परंपरावादी होने का लेबल लगाया जाता रहा हो, वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण या पुनर्निर्माण के महा आख्यान रूप में जाना जाता है। 6 जनवरी, 1940 को सियालकोट, पाकिस्तान में जन्मे कोहली ने शुरुआती तालीम लाहौर में हासिल करने के बाद भारत में जमशेदपुर से आगे की पढ़ाई की, बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि ली और 1963 से लेकर 1995 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे। छह वर्ष की अल्पवय से ही पैदा हुई लिखने की यह रुझान उत्तरोत्तर परवान चढ़ी और आज उनकी विभिन्न विधाओं में सौ से भी ज्यादा कृतियॉं हैं।
                                                                     
                            

जिस जमाने में पाठकों का रोना चल रहा हो, उनकी पुस्तकों के कितने ही संस्करण निकले और बिक रहे हैं। लेखन की दुनिया में वे किसी फैशन या विचारधारा से नहीं बँधे तथा जो चाहा वह लिखा। पाठक, पुरस्कार, पद और प्रतिष्ठा को तरजीह न देकर उन्होंने स्वांत:सुखाय को ज्यादा अहमियत दी। यही वजह है कि उनके उपन्यासों की सराहना हजारीप्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, नागर, धर्मवीर भारती, यशपाल व भगवतीचरण वर्मा जैसे कृती लेखकों ने की है।

कोहली को उपन्यासों को भी एक महाकाव्यात्मक गरिमा देने का श्रेय प्राप्त है। उन्होंने हिंदी समाज में फैलाए गए इस मिथ को झुठलाया है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं, हिंदी का पाठक गरीब है अथवा उसके पास पढ़ने का समय नहीं है । उनकी हजारों की कीमत वाली पुस्तकों के दशाधिक संस्करण छप चुके हैं तथा आज भी पाठकों में कोहली के उपन्यासों की सर्वाधिक मांग है। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, कोरोना संक्रमण हिंदी साहित्य जगत के एक और सितारे को हमसे छीन लिया।  लेकिन नरेन्द्र कोहली अपनी लेखनी और साहित्यिक योगदानों के लिए हमेशा पाठकों के दिल में जिंदा रहेंगे। उनकी समृति में पाठकों के लिए उन्हीं का एक पुराना साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा है।  उनके उपन्यास 'न भूतो न भविष्यति' पर व्यास सम्मान घोषित होने के अवसर पर उनसे हुई डॉ. ओम निश्चल की बातचीत ।

डॉ. ओम निश्चल: कहा जाता है महाभारत, रामायण, पुराण और मिथकीय आख्यानों को जिस तरह खँगाल कर आपने इन उपजीव्य ग्रंथों की कथाओं का पुनर्लेखन कर औपन्यासिकता का जो रूप प्रदान किया वह हिंदी में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कोटि में आता है। ऐसा करने के पीछे आपके मन में क्या संकल्पना थी?

नरेन्द्र कोहली: देखिए आप जानते हैं कि लिखने से पहले यह सब कुछ नहीं सोचा जाता कि इसका क्या स्वरूप बनेगा। सृजन स्वत: होता है। हॉं जब लिखा हुआ छप गया तो ऐसे प्रश्न लोगों के मन में उठे, अपने मन में भी उठे हैं। तब सोचा कि क्या यह देश की स्वतंत्रता के लिए है, पुनरुत्थान के लिए है या एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में है। मैं तो कहूँगा कि मन में जो चित्र बने, समकालीन जीवन के प्रतिबिम्ब के रूप में वे एक तरह से स्वत:स्फूर्त रूप में ही बने। इसलिए यह सब मैंने अपनी अभिव्यक्ति के लिए लिखा, स्वांत:सुखाय लिखा। इसका यश मिलेगा या अपयश यह सब नहीं सोचा। ये सारी बातें सृजन के बाद की हैं। आगे पढ़ें

3 weeks ago
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