जन-जन के रचनाकार 'अक्कितम'

अक्कितम अच्युतन नंबूदिरि
                
                                                             
                            पिछले वर्ष आज ही के दिन (15 अक्टूबर 2020) को 94 वर्ष की आयु में मलयालम भाषा के शीर्ष कवि अक्कितम अच्युतन नंबूदिरि का निधन हो गया था। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि! 
                                                                     
                            
 
अक्कितम अच्युतन नंबूदिरि मलयालम भाषा और साहित्य का ऐसा नाम या एकमात्र नाम है  जिसे ‘महाकवि’ कहा जाता है। भारतीय परपरा में महाकवि बहुत कम लोग हुए हैं और जो हुए उनमें से यादातर प्राचीन भारत के जीवन का हिस्सा रहे परन्तु अक्कितम हमारे समकालीन जीवन का हिस्सा हैं। प्राचीन काल से अब तक जीवन की परिस्थितियाँ, उत्पादन के साधन, खान-पान आदि अभूतपूर्व रूप से बदले हैं। इस दशा में तब से लेकर अब तक साहित्य ने तो अपने को बदला ही है साथ में साहित्य के प्रत्यक्ष उपभोक्ता पाठकों की जरूरत और समझ में भी बदलाव आया है। आज का जीवन निरन्तर चुनौतीपूर्ण रहा है, व्यक्तिगत और सामाजिक सबन्धों में जटिलताएँ पुराने समय की तुलना में बहुत बढ़ गई हैं। प्राचीन की तुलना में आज के समाज का जीवन सरल नहीं रह गया है इसलिए साहित्य जो किसी भी समाज का प्रत्यक्ष प्रतिबिब दिखाता है वह भी अपने समय के हिसाब से जटिलताओं को प्रकट करता है। अब महाकवि होने के लिए कविकर्म की गहराई और विस्तार का निस्सीम और गहन होना जरूरी है। अक्कितम उस साहित्यिक गहराई और विस्तार के जीवित प्रतीक हैं। मलयाली समाज का साहित्यानुराग देश के किसी भी समाज की तुलना में गहरा है और वह अपने साहित्यिक नायकों का चयन जल्दबाज़ी में नहीं करता। इस समाज में रचनाकारों का अद्भुत समान है लेकिन शर्त यही कि रचनाएँ जनोन्मुख हों। यह प्रक्रिया बहुत सरल और साफ सुथरी है। एक रचनाकार जब सबके लिए सोचता है तभी उसका लोकप्रिय होना सभव है। ऐसी प्रसिद्धि स्थायी होती है। यह रातोंरात सभव ही नहीं है।

अपनी प्रतिनिधि कविताओं की एक किताब की भूमिका में वे लिखते हैं: “सारे साहित्यकार सोचते हैं कि उन्हें उचित कीर्ति नहीं मिली है। यह बोध मुझे भी होता है कि मुझे मेरे लायक कीर्ति आज या कल जरूर मिलेगी। एक दिन सुबह जागकर उठते ही सौभाग्य के मेरे सिर पर बरस जाने जैसी कोई घटना नहीं हुई।” अक्कितम की इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें मलयाली समाज का स्नेह और समान अचानक से हासिल नहीं हुआ परन्तु जो प्राप्त हुआ वह स्थायी है। आलोचकों ने अक्कितम साहित्य की प्रशंसा खूब की है। इन सबमें एक बात जो आम तौर पर मुखर होकर आती है वह यह कि उनकी रचनाओं का गठन और उनके बिंबविधान ऐसे होते हैं कि सामान्य पाठकों को भी आसानी से समझ में आ जाएँ। जनोन्मुख साहित्य और जन के लिए साहित्य दोनों का अद्भुत समावेश उनके यहाँ दिखता है। यही कारण है कि आम बोलचाल में भी उनके द्वारा रचित पंक्तियाँ इस प्रकार समाहित हो जाती हैं जैसे वे सदियों से सामान्य लबो-लहजे का हिस्सा रहे हों।
कई बार यह देखा गया है कि लोगों ने उनकी कोई रचना नहीं पढ़ी, लेकिन उनकी लिखित पंक्तियाँ अपनी बात के समर्थन में किसी शास्त्रीय प्रमाण की तरह प्रस्तुत करते हों। इन पंक्तियों में सबसे यादा प्रयुक्त पंक्ति है ‘वेलीचम दुखमानुन्नी तमसल्लो सुखप्रदम’। सहज भाषा में बस इतना है कि ‘बच्चे, प्रकाश में दुख है और अन्धकार सुखद’। लेकिन यह वाक्य एक सपूर्ण जीवन दर्शन को निरूपित करता है जो बहु-स्तरीय अर्थ देता है। मनुष्य जब ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह दुखी हो जाता है जब तक अज्ञान रहता है वह सुखी रहता है। जानने से दुख और अज्ञान से सुख! इसके अर्थ का लचीलापन ही है कि यह मलयालम भाषा की आम बोलचाल का हिस्सा है। किसी भी रचनाकार के लिए इस तरह की जन-स्वीकृति एक बड़ी उपलब्धि की तरह है। इसी तरह की एक और पंक्ति यहाँ द्रष्टव्य है‘तेरुविल काका कोत्तुन्नु चत्तपेन्नीडे कन्नुगल, मुलचत्ती वलिक्युन्नु नरवर्ग नवातिथि’। रास्ते पर मरी पड़ी लड़की की आँखों को कौव्वा खोद रहा है, उसके स्तनों से पुरुष समाज का नया अतिथि शिशु लगा हुआ है। यह मार्मिक दृश्य समाज में स्त्रियों की सामान्य स्थिति पर तीखी टिप्पणी की तरह है। एक सजग रचनाकार का यही कर्तव्य है और समाज के प्रति देय भी कि वह अपने समाज की विसंगतियों को कितना अपनी रचनाओं में प्रकट कर पाता है। आगे पढ़ें

1 month ago

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