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कबीर: मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक 

साहित्य
                
                                                                                 
                            कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव ।
                                                                                                

भावै गुरु की भक्ति करूं, भावै विषय कमाव ।।


अनुवाद: गुरु कबीर जी कहते हैं कि मन तो एक ही है, जहाँ अच्छा लगे वहाँ लगाओ। चाहे गुरु की भक्ति करो, चाहे विषय विकार कमाओ।

कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु ।
विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखु ।।


अनुवाद: मन मस्ताना हाथी है, इसे ज्ञान का अंकुश देकर अपने वश में रखो और विषय - विष - लता को त्यागकर स्वरूप - ज्ञानामृत का शान्ति फल चखो।

मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक।।


अनुवाद: मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है।
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6 months ago

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