फूल सा इक लिफ़ाफ़ा मेरे नाम का
एक चिट्ठी थी उस में महकती हुई
- संदीप ठाकुर


मेरी ख़ातिर कोश भाग्य का घट जाता है
दिल की हर चिट्ठी का कोना फट जाता है
- मधूरिमा सिंह ...और पढ़ें
4 hours ago
                                                                           घर और बयाबाँ में कोई फ़र्क़ नहीं है
लाज़िम है मगर इश्क़ के आदाब में रहना
- अहमद जावेद 


यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
हाथ जिस तरह से आता है गरेबाँ की तरफ़
- नज़्म तबातबाई ...और पढ़ें
2 days ago
                                                                           किनारे ही से तूफ़ां का तमाशा देखने वाले
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफ़ां नहीं होता
- जगन्नाथ आज़ाद


ग़म-ए-जहान ओ ग़म-ए-यार दो किनारे हैं
उधर जो डूबे वो अक्सर इधर निकल आए
- अरशद अब्दुल हमीद ...और पढ़ें
6 days ago
                                                                           दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो 


वही होगा जो हुआ है जो हुआ करता है
मैं ने इस प्यार का अंजाम तो सोचा भी नहीं ...और पढ़ें
1 week ago
                                                                           दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के

इक फ़...और पढ़ें
1 week ago
                                                                           फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ
आज भी उस का ही कहलाता हूं मैं
- शारिक़ कैफ़ी 


बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
- बशीर बद्र ...और पढ़ें
1 week ago
                                                                           तरक्की पसंद शायरी के दौर में जिस एक शायर ने मूल लहजे को बजिद नहीं छोड़ा और तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहा, अहमद फ़राज़ शायरी में उसी शख़्सियत का नाम है। फ़ैज़ के गम-ए- दौरां अपने गम-ए-जानां की एक अलहद और पुरकशिश दुनिया बनाकर फ़राज़...और पढ़ें
                                                
1 week ago
                                                                           निदा फ़ाज़ली तरक़्क़ी पसंद रिवायत का हिस्सा थे। उन्होंने अपनी शायरी में रूढ़िवादी परंपराओं से इंहराफ़ कर एहसासों को इस सलीक़े से अपने अशआर में पिरोया है कि उनकी शायरी जीवंत हो उठती है और भेदभाव ख़त्म हो जाते हैं। नज़रों के सामने एक समान आकृतियां उभरने...और पढ़ें
                                                
1 week ago
                                                                           बंद कमरे में ज़ेहन क्या बदले
घर से निकलो तो कुछ फ़ज़ा बदले
- महताब आलम 


अक़्ल से सिर्फ़ ज़ेहन रौशन था
इश्क़ ने दिल में रौशनी की है
- नरेश कुमार शाद ...और पढ़ें
1 week ago
                                                                           हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़्सत हुआ तब याद आया


भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी ...और पढ़ें
2 weeks ago
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