आज का शब्द - देहरी और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता अंधेरे का मुसाफ़िर

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हिंदी हैं हम शब्द-श्रृंखला में आज का शब्द है 'देहरी' जिसका अर्थ है 1. द्वार की चौखट के नीचे लगने वाली लकड़ी या पत्थर जो ज़मीन पर रहती है 2. दहलीज़ 3. घर के मुख्य द्वार का बाहरी भाग। कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। 

यह सिमटती सांझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुंचकर रौशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी,
रुक गयी अब तो अचानक लहर की अंगड़ाइयां,
ताल के खामोश जल पर सो गई परछाइयां।
दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं,
एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं,
आसमां तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया,
बस धुंए के बादलों से सामने पथ घिर गया,
यह अंधेरे की पिटारी, रास्ता यह सांप-सा,
खोलनेवाला अनाड़ी मन रहा है कांप-सा।
लड़खड़ाने लग गया मैं, डगमगाने लग गया,
देहरी का दीप तेरा याद आने लग गया;
थाम ले कोई किरन की बांह मुझको थाम ले,
नाम ले कोई कहीं से रोशनी का नाम ले,
कोई कह दे, "दूर देखो टिमटिमाया दीप एक,
ओ अंधेरे के मुसाफ़िर उसके आगे घुटने टेक!" 

2 months ago
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