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Ahmad Faraz Poetry: अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं 
                                                                                                

'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं 

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र 
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं 

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो 
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं 

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता 
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं 

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में 
जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं 

ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे 
हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं 

न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई 
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं  आगे पढ़ें

1 month ago

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