आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Bashir Badr Ghazal: है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

उर्दू अदब
                
                                                                                 
                            है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है 
                                                                                                

कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है 

यूँही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख-रखाव की गुफ़्तुगू 
ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़ इसे आप से कोई काम है 

कहाँ अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें 
ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है 

वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा 
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है  आगे पढ़ें

1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X