बशीर बद्र की ग़ज़ल: वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है 

उर्दू अदब
                
                                                             
                            वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है 
                                                                     
                            
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है 

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से 
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है 

कहाँ से आई ये ख़ुशबू ये घर की ख़ुशबू है 
इस अजनबी के अँधेरे में कौन आया है 

महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से 
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है  आगे पढ़ें

1 month ago

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