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कुमार पाशी: तेरी याद का हर मंज़र पस-मंज़र लिखता रहता हूँ

कुमार पाशी: तेरी याद का हर मंज़र पस-मंज़र लिखता रहता हूँ
                
                                                                                 
                            तेरी याद का हर मंज़र पस-मंज़र लिखता रहता हूँ
                                                                                                

दिल को वरक़ बनाता हूँ और शब भर लिखता रहता हूँ

भरी दो-पहरी साए बनाता रहता हूँ मैं लफ़्ज़ों से
तारीकी में बैठ के माह-ए-मुनव्वर लिखता रहता हूँ

ख़्वाब सजाता रहता हूँ मैं बुझी बुझी सी आँखों में
जिस से सब महरूम हैं उसे मयस्सर लिखता रहता हूँ

छाँव न बाँटे पेड़ तो अपनी आतिश में जल जाता है
सिर्फ़ यही इक बात मैं उसे बराबर लिखता रहता हूँ

क्या बतलाऊँ 'पाशी' तुम को संग-दिलों की बस्ती में
मोती सोचता रहता हूँ मैं गौहर लिखता रहता हूँ 
 
1 month ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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