आसमां तक जो नाला पहुंचा है, दिल की गहराइयों से निकला है - मजाज़ लखनवी

majaz lakhnavi ghazal asmaan tak jo naala pahuncha hai
                
                                                             
                            

आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है
दिल की गहराइयों से निकला है

मेरी नज़रों में हश्र भी क्या है
मैं ने उन का जलाल देखा है

जल्वा-ए-तूर ख़्वाब-ए-मूसा है
किस ने देखा है किस को देखा है

हाए अंजाम इस सफ़ीने का
नाख़ुदा ने जिसे डुबोया है

आह क्या दिल में अब लहू भी नहीं
आज अश्कों का रंग फीका है

जब भी आँखें मिलीं उन आँखों से
दिल ने दिल का मिज़ाज पूछा है

वो जवानी कि थी हरीफ़-ए-तरब
आज बर्बाद-ए-जाम-ओ-सहबा है

कौन उठ कर चला मुक़ाबिल से
जिस तरफ़ देखिए अंधेरा है

फिर मिरी आँख हो गई नमनाक
फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है

सच तो ये है 'मजाज़' की दुनिया
हुस्न और इश्क़ के सिवा क्या है

1 month ago

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