साहिर लुधियानवी : मुझ को इस का रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें

sahir ludhianvi ghazal mere geet tumhare hain
                
                                                             
                            

अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी
मौत के क़दमों की आहट भी जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तक़बिल की किरनें भी थीं हाल की बोझल ज़ुल्मत भी
तूफ़ानों का शोर भी था और ख़्वाबों की शहनाई भी

आज से मैं अपने गीतों में आतिश-पारे भर दूँगा
मद्धम लचकीली तानों में जीवट धारे भर दूँगा
जीवन के अँधियारे पथ पर मिशअल ले कर निकलूँगा
धरती के फैले आँचल में सुर्ख़ सितारे भर दूँगा

आज से ऐ मज़दूर किसानो मेरे गीत तुम्हारे हैं
फ़ाक़ा-कश इंसानो मेरे जोग-बहाग तुम्हारे हैं
जब तक तुम भूके नंगे हो ये नग़्मे ख़ामोश न होंगे
जब तक बे-आराम हो तुम ये नग़्मे राहत-कोश न होंगे

मुझ को इस का रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें
फ़िक्र-ओ-फ़न के ताजिर मेरे शेरों को अशआर न मानें
मेरा फ़न मेरी उमीदें आज से तुम को अर्पन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे दुख और सुख का दर्पन हैं

तुम से क़ुव्वत ले कर अब मैं तुम को राह दिखाऊँगा
तुम परचम लहराना साथी मैं बरबत पर गाऊँगा
आज से मेरे फ़न का मक़्सद ज़ंजीरें पिघलाना है
आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊँगा 

2 months ago

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