आदमी न इतना भी दूर हो ज़माने से - शकील बदायूंनी

shakeel badayuni ghazal aadmi na itna bhi door ho zamaane se
                
                                                             
                            

आदमी न इतना भी दूर हो ज़माने से
सुब्ह को जुदा समझे शाम के फ़साने से

देख तिफ़्लक-ए-नादां क़द्र कर बुज़ुर्गों की
गुत्थियां न सुलझेंगी मज़हका उड़ाने से

ज़ख़्म-ए-सर के दीवाने ज़ख़्म-ए-दिल का क़ाइल हो
ज़िंदगी संवरती है दिल पे चोट खाने से

मुतरिब-ए-जुनूं-सामां तू न छेड़ ये नग़्मा
धुन ख़राब होती है तेरे गुनगुनाने से

गर्मी-ए-सुख़न से कुछ काम बन नहीं सकता
मिल ही जाएगी मंज़िल दो-क़दम बढ़ाने से

1 month ago
Comments
X