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Social Media Poetry: पसीने में भीगी हुई बनियान सा समय

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                            एक दिन जब सूरज उगेगा
                                                                                                

पसीने में भीगी हुई बनियान सा समय 
टूटी हुई चप्पल की तरह बीत रहा है 
समय किसी भी तरह बीत सकता है 
दीवार पर लगे जाले सा भी 
और गले में उगे काँटों से भी 

मेरी वह तस्वीर जिसमें मेरी सबसे निश्छल हँसी दर्ज़ है 
उसकी पीठ पर जम आया है एक घना अंधेरा 
कैसी तो त्रासदी है सिर्फ मुझे दिखता है यह अंधेरा 
और बाकी अभी भी उस हँसी में ही अटक जाते हैं 
जो अब उतनी निश्छल, उतनी सच्ची, उतनी पवित्र नहीं रही 

बचपन में आम खाकर गिठली फेंक दी थी ज़मीन पर 
अब वह पेड़ आँगन के बीचोंबीच उग आया है
इस बार भरे बंसत में काटा गया उसे 
कैसे कहा जा सकता है कि उसे काटना सिर्फ़ उसे ही काटना था 
आँगन के बीचोंबीच पालती मार कर बैठा था मेरा बचपन 
अब वहाँ उसकी स्मृति भी नहीं बैठी 
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2 months ago

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