पूजा भारद्वाज: अंत नहीं तुम्हारे दुःख का कोई...

कविता
                
                                                             
                            देखा मैंने एक सपना ,
                                                                     
                            
रो रहा था 'कल ' बैठ सामने आज के ,
कितने निष्ठुर तुम आज ,
काट डाले पेड़, खोद डाले पहाड़ ,
चीर धरती के वक्ष को घोंप दिये ट्यूबवेल ,
होने लगे विलुप्त पंछी स्थावर,
कर ही दोगे क्या पृथ्वी को निर्जन ?
बताओ, क्या भला हुआ ?
हो विवश तुम ही सांस लेने को धुंए में ,
टूटते रिकार्ड नित नए तापमान के,
स्वार्थ तुम्हारा टपक रहा पसीनों में,
ओह ! भोग रहे तुम अपनी ही करनी ,
बोये जो सल्फेट, यूरिया ,
गोबर मूत्र को कर दरकिनार ,
उग रहे अब अस्थमा, शुगर, कैंसर, कोरोना, ना जाने क्या क्या ?
अंत नहीं तुम्हारे दुःख का कोई,
पहन चोला विकास का बोई है तुमने विपदा ,
काटोगे जिसे तुम , आने वाली पीढ़ियां,
देगा भविष्य तुम्हें गालियां,
उजाड़ रहे जो तुम बसने से पहले आशियाना उसका ,
क्या दोगे जवाब उसे उसकी परेशानियों का ?
हो जिम्मेदार जिनके तुम सिर्फ़ तुम,
बोलो है क्या कोई जवाब ?
3 months ago

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