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Social Media Poetry: ऐन मुमकिन है तेरे ग़म का तक़ाज़ा कर लूँ

Social media poetry: ऐन मुमकिन है तेरे ग़म का तक़ाज़ा कर लूँ
                
                                                                                 
                            ऐन मुमकिन है तेरे ग़म का तक़ाज़ा कर लूँ
                                                                                                

ऐन मुमकिन है बिछड़ने का इरादा कर लूँ

वास्ता पिछले बरस का न दो तुम मिलने का
ऐन मुमकिन है कि इस बार मैं वादा कर लूँ
 
ग़र्क़ होने का मुझे शौक़ है, लहरों वाले !
ऐन मुमकिन है कि अब तुझ से किनारा कर लूँ

हाइल-ए-राह न हो जाये तअल्लुक़ कल को
ऐन मुमकिन है पलट जाना गवारा कर लूँ
 
साँस है जिस्म की ज़द में, जो गुनह है मुझ पर
ऐन मुमकिन है कि ये बोझ भी हल्का कर लूँ
 
एक फ़ुर्सत की है दरकार मेरे यार-ए-मन
ऐन मुमकिन है कोई और मुदावा कर लूँ

साभार रेनू नय्यर की फेसबुक वॉल से
1 month ago

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