जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला लेने का ये होता है यही समय, आप भी जान लें

लाइफस्टाइल डेस्क , अमर उजाला Published by: मंजू ममगाईं Updated Mon, 17 Dec 2018 12:12 AM IST
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stress - फोटो : file photo
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शादी, तलाक, नौकरी बदलना या फिर कोई भी और बड़ा फैसला लेने का कोई सही वक्त होता है क्या? हम जब कोई बड़ा फैसला लेते हैं, तो नफा-नुकसान तोलते हैं। आंकड़ों की मदद से ख़ुद को उसके लिए तैयार करते हैं। कई बार एक झटके में भी फैसले ले डालते हैं।बहुत से लोग साल के आखिरी महीने तक फैसला टालते हैं। वहीं, कुछ ऐसे भी होते हैं जो नए साल का इंतजार करते हैं, फैसला लेने के लिए तो, जिंदगी का बड़ा फैसला कब लिया जाना चाहिए? इस सवाल का जवाब हमारे मूड पर निर्भर करता है।

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हममें से बहुत से लोग सर्दियों में थोड़ा खिंचे-खिंचे से रहते हैं। मूड खराब रहता है। कई लोगों को तो सर्दियों में एसएडी की बीमारी यानी सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर हो जाता है। खास तौर से उत्तरी गोलार्ध में रहने वालों को। अमरीका में करीब दस फीसद आबादी इस मर्ज की शिकार है। स्विटजरलैंड में बीस साल तक चले तजुर्बे में पता चला कि वहां की 7.5 प्रतिशत आबादी एसएडी की शिकार है।

कई बार ये सीजनल मूड खराब होने का ये सिलसिला लंबा भी खिंच सकता है। इस मर्ज का शिकार औसत अमरीकी, साल के 40 फीसद टाइम सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर की चपेट में रहता है। 1980 के दशक में टेलीफोन से अमरीका में एक सर्वे किया गया था।जाड़े के दिनों में 92 प्रतिशत लोग एसएडी के शिकार पाए गए।अब आपका मूड खराब है, तो जाहिर है इसका असर आपके फैसला लेने की क्षमता पर भी पड़ेगा। मामला तब और पेचीदा हो जाता है, जब हम आपको ये बताते हैं कि खराब मूड में लिया गया फैसला हमेशा खराब ही नहीं होता।

खराब मूड में लिए गए फैसले के फायदे भी हैं

जब हम डिप्रेशन में होते हैं, तो हम जोखिम को और ज़्यादा अच्छे से समझते हैं क्योंकि खराब मूड में हम किसी चीज का लुत्फ नहीं ले पाते। भविष्य को लेकर ज़्यादा आशावान नहीं होते। तो, ऐसे वक़्त में किसी फैसले से बेहतरी की उम्मीद नहीं करते हैं। डिप्रेशन के शिकार लोग फैसला लेते वक़्त ज़्यादा विकल्पों पर गौर नहीं कर पाते, वो जोखिम नहीं लेते। सुरक्षित विकल्प को तरजीह देते हैं।यानी इस मूड में आप ने कोई फैसला लिया, तो वो जोखिम से बचाने वाला हो सकता है। एसएडी के शिकार लोग अपनी वित्तीय हालत को लेकर जो फैसले लेते हैं, वो ज़्यादातर सही साबित होते हैं।फैसला लेने वाला अगर जोखिम कम लेना चाहता है, तो ये बुरी बात नहीं होती।

इसकी वजह है

जो लोग आशावादी होते हैं। दिमागी तौर पर वो ये सोचते हैं कि उन्हें नुकसान होगा ही नहीं। वो बुरा तजुर्बा नहीं करेंगे। वो ये सोचते हैं कि भविष्य बेहतर होगा। हालात काबू में ही रहेंगे।वहीं, डिप्रेशन के शिकार लोग निराशावादी होते हैं। उन्हें भविष्य को लेकर बहुत उम्मीद नहीं होती। यानी वो जोखिम का ज़्यादा सटीक हिसाब लगाते हैं। हालांकि, ये जरूरी नहीं कि डिप्रेशन में वो भविष्य की सही तस्वीर देख पाते हैं। देखा गया है कि डिप्रेशन के शिकार लोग विश्व कप के मैचों की सही भविष्यवाणी तक नहीं कर पाते।

जो लोग आशावादी होते हैं, वो बेहतर भविष्य के लिए पूरी ताकत से काम भी करते हैं। करियर में ज़्यादा कामयाब होते हैं। उनके रिश्ते बेहतर होते हैं।आशावादी लोग ये भी सोचते हैं कि उन्हें कोई बीमारी नहीं होगी।नतीजा ये कि उनकी सेहत भी बेहतर होती है लेकिन, कई बार जिंदगी के बड़े फैसले लेने के लिए गर्मियों के आने का इंतजार करना भी ठीक हो सकता है।उन दिनों में रोशनी ज़्यादा होती है।चटख माहौल में अनिर्णय की स्थिति नहीं रहती। फैसला लेने में आसानी होती है।

कुल मिलाकर हम किस नतीजे पर पहुंचे?

हमारे मूड और फैसला लेने की क्षमता के बीच संबंध पेचीदा है।अगर आप कोई बड़ा फैसला लेना चाहते हैं, तो ये देखिए कि वो फैसला क्या है? क्या उससे बहुत भारी नुकसान की भी आशंका है? क्या उसमें सावधानी बरतने की जरूरत है? अगर ऐसा है, तो सर्दियों के दिनों में ये फैसला लेना ज़्यादा ठीक होगा ।लेकिन, अगर कोई फैसला जोखिम नहीं लेने वाला है। जिसमें चित होने पर तो फायदा है ही, पट रहने पर भी नुकसान ज़्यादा नहीं होना है, तो गर्मी आने का इंतजार कर लीजिए।अनिर्णय के शिकार हैं, तो भी मौसम के खुलने और चटख दिनों के आने का इंतजार करना ज़्यादा सही रहेगा। हो सकता है कि बड़े दिन होने पर आपका अनिर्णय भी खत्म हो जाए।

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