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अयोध्या जमीन विवाद : मेयर के भांजे से नजूल की जमीन खरीदकर और फंस गया ट्रस्ट

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अयोध्या/धीरेंद्र सिंह Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 21 Jun 2021 12:18 AM IST

सार

राजस्व विभाग के अफसर ने कहा कि फ्रीहोल्ड हुए बगैर बिक्री-नामांतरण अवैध, रजिस्ट्री रद्द हो जाएगी। बताया जाता है कि दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से दीप नारायण ने 20 लाख में खरीदा, फिर ट्रस्ट को 2.5 करोड़ में बेच दिया।
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राम मंदिर के लिए चल रहा खोदाई कार्य।
राम मंदिर के लिए चल रहा खोदाई कार्य। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से बगैर वैधानिक जांच-पड़ताल के बिचौलियों के जरिए कराई जा रहीं भूमि-भवन की रजिस्ट्रियां फंसती जा रही हैं। ताजा मामला बेहद गंभीर और चौंकाने वाला है। अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीप नारायण ने दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से जो जमीन 20 लाख में खरीदकर ढाई करोड़ रुपये में ट्रस्ट को बेची थी, वह दस्तावेजों में नजूल की है। राजस्व विभाग के आला अधिकारी नियमों का हवाला देते हुए कहते हैं कि बगैर फ्रीहोल्ड कराए इस भूखंड की बिक्री अवैध होगी, तहसील से नामांतरण नहीं हो सकता।
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अयोध्या में सदर तहसील के ग्रामसभा कोट रामचंदर, परगना हवेली अवध की गाटा संख्या 135 रकबा 0.126 एकड़ यानि 890 वर्गमीटर भूमि नजूल दर्ज है। इसका स्वामित्व सरकार के पास है। कागजातों में सरकार बहादुर खेवट एक से महंत विश्वनाथ प्रसादाचार्य काश्तकार के रूप में दर्ज हैं। इसी भूखंड को यहां की सबसे बड़ी पीठ दशरथ महल बड़ास्थान के महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य चेला स्व. महंत विश्वनाथ प्रसादाचार्य ने 22 फरवरी 2021 को 20 लाख में मेयर के भांजे दीप को बेची थी। दीप ने करीब ढाई माह बाद इसी जमीन को ढाई करोड़ में ट्रस्ट को बेच दिया।


रजिस्ट्रीकर्ता को सच्चाई बतानी चाहिए
‘ट्रस्ट की भूमि खरीद-फरोख्त मामलों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। बगैर फ्रीहोल्ड या पर्चा दर्ज हुए नजूल भूमि की रजिस्ट्री करने का अधिकार नहीं है। रजिस्ट्रीकर्ता को सच्चाई बतानी चाहिए।’
- अनुज कुमार झा, डीएम अयोध्या

बताया था कि जमीन नजूल की है
‘दीप नारायण को मैंने जमीन फरवरी में बेची थी। मुझे कहा गया कि रामलला ट्रस्ट को जमीन की आवश्यकता है। मैंने बता दिया था जमीन नजूल की है, मेरी निजी नहीं है, बल्कि कब्जा है। मुझे 30 लाख देकर दो जगह कब्जा लिखाया था। ट्रस्ट के लोग मुझसे नहीं मिले थे, मेयर मिले थे। ट्रस्ट को ढाई करोड़ में कैसे बेची गई, मैं नहीं जानता। मुझे तो पता था कि यह जमीन मेरी थी ही नहीं, नजूल की है, तो जो मिला वही बहुत था।’
- देवेंद्र प्रसादाचार्य, महंत दशरथ महल बड़ा स्थान

‘ट्रस्ट ने जो नजूल भूमि खरीदी है, वह हमारे कब्जे में थी, खेती करते थे। उससे सटी हुई मेरी भूमि धरी है। कोरोना के दौरान एडीएम प्रशासन संतोष कुमार सिंह मौके पर दल-बल के साथ आए और कहा कि भूमि ट्रस्ट को देनी है, खाली कर दीजिए। मैंने इसमें से तीन बिस्वा फकीरे राम मंदिर को नापकर दिया। बाकी सात बिस्वा ट्रस्ट को दे दी। सबको पता था कि यह नजूल है।’
- बृजमोहन दास, महंत चौबुर्जी मंदिर
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जमीन खरीद को लेकर खड़े हो रहे कई सवाल, रजिस्ट्रियों को लेकर घिर रहा राममंदिर ट्रस्ट 

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