हिंदी दिवस पर विशेष: नई पीढ़ी में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रहे ये हिंदी सेवी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 14 Sep 2021 04:30 PM IST

सार

हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आज हम आपसे कुछ ऐसे हिंदी सेवियों का परिचय करा रहे हैं जो अलग-अलग तरीकों से हिंदी को नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
डॉ. दिनेश चंद्र अवस्थी, शरद आलोक व कुमार मनोज।
डॉ. दिनेश चंद्र अवस्थी, शरद आलोक व कुमार मनोज। - फोटो : amar ujala
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विस्तार

हिंदी मात्र भाषा नहीं, हमारी मातृभाषा भी है। हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से कई हिंदी सेवी अपने-अपने तरीके से जुटे हुए हैं। कोई युवाओं को मंच दे रहा है तो कोई हिंदी सेवियों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें सम्मानित कर उत्साहित कर रहा है। तो कोई विदेशों में रहकर हिंदी को न सिर्फ प्रचारित-प्रसारित करने में जुटा है बल्कि वहां रह रहे भारतवंशियों को हिंदी में लिखने-बोलने और हिंदी साहित्य के नव उत्थान में अहम भूमिका निभा रहा है।
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इन हिंदी सेवियों का मानना है कि जब तक मातृभाषा को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय नहीं बनाया जाएगा, तब तक इसके विकास को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इनका कहना है कि हिंदी में काम करने वालों को प्रोत्साहन मिलना जरूरी है, साथ ही इसे रोजगार की भाषा के रूप में स्थापित करना होगा जिससे युवा इसकी ओर आकर्षित हो सकें।


हिंदी सेवियों के उत्साहवर्धन के लिए दो दशक से सक्रिय डॉ. दिनेश चंद्र अवस्थी
70 वर्षीय डॉ. दिनेश चंद्र अवस्थी विधानसभा से विशेष सचिव एवं वित्त नियंत्रक के पद से सेवानिवृत्त हैं और कई दशकों से साहित्यिक सेवारत हैं। वे हिंदी सेवियों व साहित्यकारों के उत्साहवर्धन के लिए पिछले दो दशक से सक्रिय हैं। उन्होंने ही तकरीबन 21 वर्ष पूर्व राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की स्थापना की। यह संस्था हिंदी साहित्य में योगदान के लिए राज्य कर्मचारियों को पुरस्कृत करती है। एक-एक लाख रुपये के 24 पुरस्कार संस्था की ओर से दिए जाते हैं। इसके अलावा गैर राजकीय कर्मचारियों को भी संस्था की ओर से पुरस्कृत किया जाता है। छह दिसंबर 2020 तक लगातार बीस वर्षों तक डॉ. अवस्थी संस्था के महामंत्री रहे। वहीं त्रैमासिक पत्रिका अपरिहार्य भी संस्था की ओर से प्रकाशित की जा रही है।

कविता पर आधारित कार्यक्रम साहित्य सरिता के 104 एपिसोड का प्रसारण दूरदर्शन पर किया जा चुका है। इसके अलावा डॉ. अवस्थी की पुस्तक कवि प्रदीप का हिंदी साहित्य में अवदान को 2010-11 में 51 हजार का पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से सर्जना पुरस्कार मिल चुका है। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए साहित्यकार सम्मान 2020 दिया गया तो वहीं 2021 में राज्य कर्मचारी संस्थान की ओर से एक लाख का पुरस्कार प्रदान किया गया। गद्य और पद्य दोनों में लेखन करने वाले डॉ. दिनेश चंद्र अवस्थी बताते हैं कि हिंदी के उत्थान के लिए हम सबको मिलकर पहले अपने घर से और फिर पूरे समाज में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।

युवा कवियों को मंच दे रहे कुमार मनोज

मूल रूप से इटावा के निवासी कवि कुमार मनोज खुद हिंदी काव्य मंचों पर कई वर्षों से सक्रिय हैं। इसके अलावा वे युवा कवियों को भी आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। पिछले साल से उन्होंने राजधानी के सरोजनीनगर में युवा कवियों को मंच देने के उद्देश्य से प्रशस्ति स्टूडियो की स्थापना की।

इस स्टूडियो में वरिष्ठ रचनाकारों के साथ ही नवांकुरों को भरपूर मौका मिलता है। उनके लिए काव्य समारोहों का आयोजन किया जाता है जिसकी रिकॉर्डिंग स्टूडियों में की जाती है और फिर उनके वीडियो को यू-ट्यूब पर डाला जाता है। कुमार मनोज बताते हैं कि उनके यू-ट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स की संख्या कई लाख पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि मुझे काफी समय से यह महसूस हो रहा था कि युवा रचनाकारों में काफी प्रतिभा है और उसे आगे बढ़ाना चाहिए।

विदेशों में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल : शरद आलोक

नार्वे में पिछले 40 सालों से स्पाइल दर्पण और वैश्विका पत्रिका का संपादन कर रहे लखनऊ निवासी वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में हिंदी का पठन-पाठन बढ़ा है और हिंदी साहित्य ने भी विकास की राह पकड़ी है। शरद आलोक का पिछले दिनों कोरोना काल में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘लॉकडाउन’ काफी चर्चा में रहा।

इस दौरान उन्होंने डिजिटल मंच पर हिंदी सेवियों को इकट्ठा कर बहुत से आयोजन कराए जिनकी देश-विदेश में चर्चा रही। एक नाटककार, कवि और लेखक के रूप में कई दशकों से सक्रिय शरद आलोक को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अलावा कई प्रदेशों के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है तो वहीं नार्वे साहित्य का हिंदी में और हिंदी साहित्य का नार्वेजियन भाषा में अनुवाद कर उन्होंने दो देशों के साहित्य के बीच पुल का काम किया है। शरद आलोक का कहना है कि विदेशों में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।
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