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UP Election 2022 : पिछली बार इन सीटों पर जीत और हार का अंतर पांच हजार से भी कम मतों का था, इस बार क्या समीकरण होंगे?

अजीत बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Tue, 18 Jan 2022 09:58 AM IST

सार

44 सीटों पर हार-जीत पांच हजार से कम मतों से हुई। 11 सीटों पर हार-जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा थे नोटा के वोट। 4057 वोटों से जीते डॉ. धर्म सिंह सैनी राज्यमंत्री बनाए गए। 3546 मतों से जीते धर्मपाल सिंह भी शुुरुआती सवा दो साल कैबिनेट मंत्री रहे। 1473 मतों से जीते राजेंद्र प्रताप सिंह उर्फ मोती भी कैबिनेट मंत्री बने।
यूपी चुनाव इतिहास
यूपी चुनाव इतिहास - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

आज कहानी उनकी जो पूरी बहादुरी से लड़े। हर मोर्चे पर डटे रहे। सारे समीकरण साधे। उत्साह के साथ। जीत का इत्मीनान भी था। मझधार से पार भ्ाी हो गए। पर, किनारे पर आकर डूब गए! किनारे पर डूबना, कहीं ज्यादा दर्द देता है। ज्यादा टीस देता है। साल 2017 में 44 ऐसे योद्धा थे, जिनका प्रदर्शन शानदार था। पर, उनके हिस्से जीत की खुशी नहीं आई। स्कोर बोर्ड पर जब भी वे नजर दौड़ाते हैं। जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा और वोट काटने वालों को मिले मतों को देखकर आह बढ़ जाती है। काश...! पर, सियासत के शब्दकोश में काश शब्द नहीं होता। चुनावी चौसर पर तो सिर्फ और सिर्फ शह और मात होती है। ऐसे ही योद्धाओं की कहानी बयां करती यह खास रिपोर्ट...

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यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव में 44 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत-हार का अंतर पांच हजार मतों से कम का रहा था। कहीं एक जाति या मजहब के दो दिग्गज मजबूती से लड़े तो तीसरे को फायदा मिला, तो कहीं वोट काटने वाले प्रत्याशियों ने चुनौती खड़ी कर दी। नोटा के ‘सोटा’ ने भी खूब रंग दिखाया। 11 सीटें ऐसी थीं जिनपर नोटा को मिला वोट, हार-जीत के अंतर से अधिक था। इस गुणा-भाग में सबसे ज्यादा 16 सीटों पर नुकसान सपा को उठाना पड़ा था। वहीं, बसपा  भी मामूली अंतर से 10 सीटें जीतने से चूक गई थी।


अब कहानी उन योद्धाओं की जो जीत के बेहद करीब थे। प्रदेश में सबसे कम 171 वोट से डुमरियागंज में भाजपा के राघवेंद्र प्रताप सिंह जीते थे। यहां दूसरे नंबर पर थीं बसपा की सैयदा खातून। राघवेंद्र को 67,277 वोट तो सैयदा खातून को  67,056 मत मिले थे। मतों के स्कोर बोर्ड पर नजर दौड़ाएं तो नोटा को 1611 वोट मिले थे। इस सीट पर मुस्लिम मतदाता बंटे, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। सहारनपुर की रामपुर मनिहारन सुरक्षित सीट पर भी यही हाल रहा। यहां भाजपा के देवेंद्र कुमार निम ने बसपा के रविंद्र कुमार मोल्हू को महज 595 मतों के अंतर से हराया था। यहां नोटा को 856, तो रालोद प्रत्याशी को 695 मत मिले थे। मथुरा की मांट सीट से बसपा के श्याम सुंदर शर्मा मात्र 432 वोटों से जीते थे। यहां दूसरे नंबर पर रालोद के योगेश चौधरी रहे। यहां नोटा को 1253 वोट मिले थे।

मोहनलालगंज : 530 वोटों से जीती थी सपा, 3471 मत मिले थे नोटा को
लखनऊ की मोहनलालगंज सुरक्षित सीट पर सपा के अंबरीष पुष्कर ने बसपा के राम बहादुर को 530 वोटों से हराया था। यहां नोटा के हिस्से में 3471 मत गए थे। मोहनलालगंज में भाजपा समर्थित प्रत्याशी आरके चौधरी भी मैदान में थे। पर, उनके कमल चिह्न पर नहीं लड़ने से भी सपा-बसपा का मुकाबला बेहद करीब का हो गया। श्रावस्ती में भाजपा के रामफेरन सपा के मो. रमजान से मात्र 445 वोटों से जीते। ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रत्याशी ने 2932 वोट पाकर सपा का खेल खराब कर दिया। मुबारकपुर में बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ने सपा के अखिलेश यादव को 688 मतों से हराया था। यहां पीस पार्टी समेत दो छोटे दलों ने यादव प्रत्याशी उतार कर सपा के लिए समस्या पैदा कर दी थी।

बदली रणनीति

कम अंतर से जीतीं सीटों पर बसपा की खास तैयारी 
धौलाना विधानसभा सीट पर बसपा उम्मीदवार ने पिछले चुनाव में भाजपा को पटखनी दी थी पर जीत का अंतर पांच हजार वोटों से कम था। इसी तरह से मांट में बसपा ने रालोद को हराया था। आरक्षित सीट सिधौली पर भी बसपा ने सपा को पटखनी दी थी। चिल्लूपार में भाजपा उम्मीदवार नजदीकी मुकाबले में बसपा प्रत्याशी से हार गए थे। मुबारकपुर में बसपा ने सपा को हराया था। दीदारगंज में भी बसपा ने सपा को पटखनी दी थी। सुरक्षित सीट लालगंज में बसपा ने भाजपा को हराया था। ये सभी सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर पांच हजार वोटों से कम रहा था। बसपा इन सात सीटों के लिए खास तैयारी कर रही है। पूरी टीम को कहा गया है कि इन सीटों पर अतिरिक्त मेहनत की आवश्यकता है। ऐसे में अपने अभियान को तेज करें।

सपा ने समीकरण बदले, हर स्तर पर बढ़ाई चौकसी
प्रदेश की जिन 16 सीटों पर सपा पांच हजार से कम वोट से हारी थी, वहां इस बार संगठन की सक्रियता से बूथ प्रबंधन तक पर पुख्ता तैयारी की गई है। गठबंधन की वजह से करीब आधा दर्जन सीटों पर उम्मीदवार भी बदल गए हैं। सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल का दावा है कि इस बार कोई भी सीट नहीं हारेंगे। सपा से साथ गठबंधन में शामिल सभी दलों के कार्यकर्ता अपने स्तर पर लगे हुए हैं। जातीय समीकरण पूरी तरह से सपा गठबंधन के पक्ष में है।

193 मतों के अंतर से जीते थे अवतार सिंह भड़ाना
मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट पर सपा और बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। यहां बसपा भी पूरी ताकत से लड़ी। इसका नतीजा रहा कि महज 193 मतों के अंतर से भाजपा से अवतार सिंह भड़ाना जीते थे। बिजनौर की नजीबाबाद सीट पर भी सपा और बसपा दोनों ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। लेकिन, वोटकटवा प्रत्याशियों की वजह से भाजपा यह सीट महज 2002 मतों के अंतर से हार गई। सहारनपुर में भाजपा 4636 मतों के अंतर से हारी। यहां बसपा ने मुकेश दीक्षित को टिकट दिया, जिन्हें वोट तो 17,092 ही मिले थे, पर ब्राह्मण मतों में उन्होंने बंटवारा कर सपा के संजय गर्ग की राह जरूर आसान कर दी थी। 

दस सुरक्षित सीटों पर रहा कांटे का मुकाबला
मऊ जिले की मुहम्मदाबाद गोहना सुरक्षित सीट से भाजपा के श्रीराम सोनकर बसपा के राजेंद्र कुमार से 538 मतों के अंतर से जीते थे। भदोही में भाजपा के रविंद्रनाथ त्रिपाठी सपा के जहीद बेग से मात्र 1105 अधिक वोट पाकर विधायक बने। यहां बहुजन मुक्ति पार्टी के यादव प्रत्याशी को 1354 वोट मिले, जो सपा के परंपरागत समर्थक माने जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में पांच हजार से कम अंतर से हार-जीत वाली सीटों में 10 सुरक्षित श्रेणी की थीं। 

जनता की प्रत्याशियों से नाराजगी ऐसी

दुद्धी में 1085 वोटों से हुई थी हार, 8522 ने चलाया नोटा का सोटा
सोनभद्र की दुद्धी सीट एक मिसाल है, जहां प्रत्याशियों के प्रति नाराजगी ने हार-जीत के समीकरण बदल दिए। इस सीट पर महज 1085 वोटों के अंतर से अपना दल के हरिराम जीते थे। बसपा प्रत्याशी विजय सिंह गोंड दूसरे नंबर पर रहे थे। यानी मुकाबला बेहद कांटे का था। मतों के स्कोर बोर्ड पर नजर दौड़ाएं तो यहां 8522 मतदाताओं ने नोटा के विकल्प का इस्तेमाल किया था।

कम अंतर से हारी सीटों पर 2020 से ही काम में जुट गई थी भाजपा
भाजपा जिन 84 सीटों पर हारी थी, उनके लिए पार्टी ने 2020 में ही खास ऐसे क्षेत्रों में प्रभारी नियुक्त कर हर समीकरण साधने की कोशिश की  रणनीति तैयार कर ली थी। इस रणनीति में उन सीटों पर खास फोकस किया गया, जहां वह पांच हजार से कम मतों के अंतर से हारी थी। ऐसी सीटों पर सांसदों के साथ निगम, आयोग और बोर्डों के अध्यक्षों को प्रभारी बनाया गया। प्रभारियों की तैनाती में जातीय समीकरणों को तवज्जो दिया गया। प्रभारियों को हर महीने सीटों का दौरा कर वहां जाजम बिछाने की योजना भी सौंपी गई। सरकार और संगठन की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी ने वहां काम शुरू किया।

रणनीति के तहत ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, डॉ. दिनेश शर्मा और प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने अगस्त से दिसंबर 2021 के बीच सभाएं कीं। इन क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान और विकास पर जोर दिया गया। सूत्रों के मुताबिक एक-एक विधानसभा क्षेत्र में 500 से 700 करोड़ रुपये तक की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण, शिलान्यास किया। पार्टी के प्रदेश महामंत्री गोविंद शुक्ला बताते हैं, चुनाव प्रचार में पार्टी ने ऐसी सीटों पर ज्यादा फोकस किया है। इन सीटों पर जातीय समीकरण के हिसाब से नेताओं को घर-घर जनसंपर्क और प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। खासतौर पर इन सीटों पर लाभार्थियों से संपर्क को बढ़ाया जा रहा है।
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