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हिंदी के उपभोक्ता तो हैं, पाठक कहां गए?

मधुकर उपाध्याय/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी Updated Sun, 14 Sep 2014 03:27 PM IST
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नए मीडिया और पारंपरिक मास मीडिया में हिंदी बेशक लोकप्रिय हो गई है और उसका बाजार भी पुख्ता हो गया है लेकिन साहित्य में उसकी स्थिति खास बदली नहीं है।



हैरानी है कि विशाल उपभोक्ता आबादी वाले हिंदी भूभाग में हिंदी के अखबार और फिल्में, सीरियल, शो आदि तो खूब चल रहे हैं लेकिन किताबों की दुनिया का अंधेरा जस का तस बना हुआ है।


किताबें बेशक बड़े पैमाने पर आ रही हैं लेकिन इनमें साहित्य के इतर विषय ज्यादा हैं। उनकी मांग है बाजार में, अक्सर प्रकाशक यही कहते हैं।

हिंदी कविता को तो भूल ही जाइए। इस बार का हिंदी दिवस, आधुनिक हिंदी कविता के सबसे बड़े कवियों में एक गजानन माधव मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि (11 सितंबर) से होकर गुजरेगा।

क्या सचमुच हिंदी 'अंधेरे में' है। उसका पाठक सिकुड़ गया है, उपभोक्ता बढ़ता जा रहा है।

सीरियल और फिल्म

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हिंदी साहित्य की इस हालत के लिए कौन ज‌िम्मेदार है। बाजार का रोना तो बंद करना पड़ेगा। हिंदी कोई समाज से अलहदा चीज तो है नहीं कि बाजार के संपर्क में आने से छूमंतर हो जाएगी।

क्या हिंदी का प्रकाशन तंत्र इसके लिए ज‌िम्मेदार है या हिंदी को मठ बनाकर माला डाले घूम रहे साहित्य और भाषा के दिग्गज इसके ज‌िम्मेदार हैं।

मोटा अनुमान है कि हिंदी क्षेत्र की आबादी इस देश में 50 करोड़ से ज़्यादा ही होगी। किताबों के खरीदार तो हैं लेकिन वे क्या कंटेंट चाह रहे हैं।

साहित्य खरीदने वाला पाठक छिटककर उपभोक्ता ही रह गया है। हिंदी में वो सिर्फ सीरियल देखेगा या मसाला फ‌िल्म।

हिंदी का अगर एक लोक है तो उसका एक तंत्र भी है। वो सरकार का है, प्रशासन और प्रबंधन का है और वो भाषा और साहित्य का भी है।

इस तंत्र के अधिकारी और कारिंदे हिंदी के भीतर ही वर्चस्व का खेल रचने लग जाते हैं। हिंदी राजभाषा के रूप में इनके विचारों और कृत्यों में उत्पात मचाती है।

सफलता और पुरस्कार

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वो वंचितों, सार्थक रचनाकारों और नवांगुतकों को हैरान परेशान और बेदखल करती रहती है। एक लेखक अपने समय को सूंघता हुआ इतना बड़ा और कद्दावर हो जाता है कि उसे बाकी लोग तुच्छ घास लगने लगते हैं।

वह घास की नोकों को अपना विरोध मानकर उन्हें कुचलता है। उस जंगल को प्रश्रय देता है जहां उसके गुणगान और आरती में झुका झाड़झंकाड़ उलझा हुआ है।

हिंदी में कंधे रगड़ खा रहे हैं। सत्ता नजदीकियां सफलता और पुरस्कारों पर नृत्य करती हैं। एक दिल्ली नहीं, हिंदी की कई दिल्लियां हैं। बिल्लियां जो होंगी सो होंगी।

अब भाषा का इतना राजधानीकरण करते रहेंगे तो आप ही बताइए किस भले मानस का मन लगेगा। चारों ओर भगत ही भगत नजर आते हैं।

भाषा का भगत बनने से किसने रोका है, अच्छी बात है। लेकिन बगुला भगत तो मत बनिए।
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