राजपथ पर खास: भारतीय सेना की परेड में दिखेंगे ये खास हथियार, 1971 और 1965 की जंग में पाकिस्तान के छुड़ाए थे छक्के

Harendra Chaudhary
Updated Wed, 26 Jan 2022 05:22 AM IST
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देश इस बार अपना 73वां गणतंत्र दिवस मनाएगा। इस बार का गणतंत्र दिवस कई मायनों में अनोखा होगा। इस साल राजपथ पर आजादी के अमृत महोत्सव की छटा देखने को मिलेगी। आजादी के 75 साल पूरे होने पर 75 एयरक्रॉफ्ट का फॉर्मेशन देखने को मिलेगा, जिसमें सेना में शामिल हेलिकॉप्टर्स और एयरक्रॉफ्ट हिस्सा लेंगे। इसके अलावा अमृत महोत्सव के तहत राजपथ पर 1965 और 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर हुई जीत का जश्न देखने को भी मिलेगा। इसमें 1965 और 1971 की जीत में शामिल उन हथियारों का भी प्रदर्शन किया जाएगा, जिन्हें इस्तेमाल कर भारतीय सैनिकों ने उस दौरान दुश्मन की सेना को धूल चटाने में किया था। आइए जानते हैं उन हथियारों के बारे में जो इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं और इस बार राजपथ को सुशोभित करेंगे...
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ब्रिटिश सेंचुरियन टैंक

सबसे पहले बात करते हैं 1965 और 1971 की जंग में पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल हुए उन हथियारों की, तो इनमें सबसे पहले आता है ब्रिटिश सेंचुरियन टैंक। 1965 की जंग में मुख्य युद्धक टैंक होने के नाते इस टैंक ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। इस टैंक ने पाकिस्तान के उन पेंटन टैंकों से मुकाबला किया, जो अमेरिका से आयातित M47 पेंटन टैंकों से मुकाबला किया, जो तकनीक में भी सेंचुरियन के मुकाबले बेहद अत्याधुनिक थे। 52 टन वजनी और 9.8 मीटर लंबे इस टैंक में 105 एमएम की L7 झिरी गऩ लगी थी। इस टैंक को चार लोग चलाते थे। इसकी रप्तार 35 किमी प्रति घंटा और 450 किमी की ऑपरेशनल रेंज में यह युद्ध लड़ सकता था। बसंतर की लड़ाई में पाकिस्तान के एक कोर के एक आर्मर्ड डिवीजन और आर्मर्ड ब्रिगेड ने सेंचुरियन टैंकों से लैस भारतीय 1 कोर की दो ब्रिगेडों का सामना किया और इस युद्ध में पाक सेना के 46 पेंटन टैंक नष्ट हुए। पूना हॉर्स के परमवीर चक्र से सम्मानित सेंकड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अपने फामा गुस्ता सेंचुरियन टैंक से पाकिस्तान के कई टैंक बरबाद किए।
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पोलिश पीपुल्स रिपब्लिक (पोलैंड) और चेकोस्लोवाकिया ने इस एंफीबियस कैटेगरी के आर्मर्ड पसर्नल कैरियर को बनाया था। एंफीबियस कैटेगरी के होने का मतलब है कि यह जमीन और पानी दोनों जगह चल सकता है। 1971 की बसंतर की लड़ाई में इसने भी अहम भूमिका निभाई थी। नाइट विजन से लैस इस 15 टन वजनी इस वाहन की लंबाई 7.1 मीटर थी और भारतीय सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह पर जाने में इसने अहम भूमिका निभाई, जिसे देख कर पाकिस्तान के हुक्मरान भी हैरान रह गए थे। इसमें दो ड्राइवर, एक कमांडर और 16 अन्य लोग बैठ सकते थे। पानी में इसकी रेंज 150 किमी तक थी।  

 
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फ्लोटिंग टैक के नाम से मशहूर यह टैंक सावियत काल का है। यह उन चुनिंदा टैंकों में से है, जिसने 1965 और 71 की जंग में हिस्सा लिया। लाइट टैंक की श्रेणी में आने वाले इस 39 टन के वजनी टैंक की लंबाई 7.63 मीटर थी और इसमें चालकदल के तीन लोग बैठ सकते थे। यह टैंक जमीन पर 44 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता था। इसमें एक राइफल्ड गन और एक मशीन गन माउंट थी। 1971 की जंग में भारत के पूर्वी मोर्चे पर ये टैंक काफी कम संख्या थे, जबकि इनके मुकाबले पाकिस्तान के M24 चाफी टैंकों की संख्या कहीं ज्यादा थी। बावजूद इसके पीटी-76 ने गरीबपुर, बोयरा, हिल्ली और रंगपुर की लड़ाई में कई चाफी टैंकों को नष्ट किया।
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फ्रांस निर्मित यह टैंक 1952 में बनना शुरू हुआ था और 1987 तक इसका इस्तेमाल किया गया। इस टैंक की 7700 यूनिट बनी थीं। 14.5 टन वजनी इस टैंक में तीन कर्मी ही बैठ सकते थे और इसकी लंबाई 6.36 मीटर थी। इस टैंक ने इस टैंक में 105 एमएम की गन लगी थी, जो इस टैंक को बेहद घातक बनाती थी। यह टैंक 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता था और इसमें लगी गन एक बार में 3600 राउंड फायर कर सकती थी। वेस्टर्न कमांड में पाकिस्तान के हमले के नेस्तानाबूद करने के लिए इस टैंक को लगाया था। इस टैंक ने 1971 की जंग में पाकिस्तान के M48 पैंटन और M46 शर्न टैंकों से लोहा लिया था।
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