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स्वर्णिम कामयाबी: जीत के बाद बोले लक्ष्य सेन, कहा था पदक लेकर आऊंगा रंग चाहे कोई भी हो, फिर ऐसे पूरा किया वादा

अभिषेक सिंह, अमर उजाला, हल्द्वानी Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 09 Aug 2022 10:08 AM IST
राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद लक्ष्य सेन
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‘भारत के लिए पदक लेकर आऊंगा, भले ही रंग चाहे कोई भी हो...’ ये शब्द लक्ष्य सेन के हैं जो उन्होंने बर्मिंघम रवाना होने से पहले अमर उजाला से हुई बातचीत में कहे थे। सोमवार को लक्ष्य सेन ने राष्ट्रमंडल खेलों के अंतिम दिन बैडमिंटन के एकल मुकाबले के फाइनल में मलयेशिया के त्जे यंग को तीन गेम तक चले मुकाबले में एक के मुकाबले दो सेट से शिकस्त देकर अपना वादा पूरा किया। 

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फोन पर हुई बातचीत में लक्ष्य ने बताया कि राष्ट्रमंडल खेलों का सफर उनके लिए आसान नहीं था। इंडोनेशिया में लगी चोट के बाद टेंशन इस बात की थी कि राष्ट्रमंडल खेलों से पहले मैं ठीक हो पाऊंगा या नहीं।

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पिता और मेरे कोच डीके सेन, भाई चिराग और मां निर्मला ने कहा कि चोट के बारे में सोचने के बजाय इससे कितनी जल्दी ठीक हो सकता है, इस पर ध्यान दें। माता-पिता की सीख और प्रशिक्षकों और फीजियों की सलाह पर काम किया नतीजतन जल्द ही फिट हुआ और नतीजा सबके सामने है।

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लक्ष्य सेन
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फाइनल में पहला सेट 19-21 से हारने के बाद कुछ पल के लिए तनाव में आया था लेकिन फिर अपने खेल पर फोकस किया और दूसरा सेट 21-9 और 21-16 से जीतकर राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए एक और पदक जीतने में कामयाब हुआ। साल की शुरुआत में इंग्लैंड ओपन में खेलने का फायदा भी राष्ट्रमंडल खेलों में मिला। 
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लक्ष्य सेन
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लक्ष्य की इंजरी का पता चलने पर भारतीय खेल प्राधिकरण के टॉप्स (टॉरगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम) से जुड़े अधिकारियों ने डॉक्टर पर्डीवाला के साथ ही फीजियो हीथ मैथ्यूज, अब्दुल वाहिद से संपर्क साधा। इन तीनों की देखरेख और खुद की प्रबल इच्छा की बदौलत लक्ष्य जल्द ही इंजरी से उबर गए।
लक्ष्य सेन
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ट्रेनर अमित के साथ ही कोच प्रकाश पादुकोण, विमल कुमार, मिस्टर यो का भी योगदान किसी भी मायने में कम नहीं है।  डीके सेन और मां निर्मला धीरेंद्र सेन ने बताया कि चिराग और लक्ष्य के होने से पहले ही तय कर लिया था कि बेटा हो या बेटी दोनों को बैडमिंटन खिलाड़ी ही बनाना है।
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लक्ष्य सेन
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डीके सेन भारतीय खेल प्राधिकरण में प्रशिक्षक थे तो उनका लखनऊ से अल्मोड़ा तबादला हुआ तो सुबह चार बजे से लेकर रात 10 बजे तक उनका समय स्टेडियम में बच्चों को सिखाने में बीतता था। बकौल डीके सेन लक्ष्य को बचपन में स्टेडियम में ले जाने लगा तो उसने बिना कुछ कहे रैकेट पकड़ा और आज अपने नाम और हम दोनों के सपने को साकार करके दिखाया है। 
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