The Married Woman Review: महिला दिवस की फैक्ट्री से निकला एक और औसत उत्पाद, मिले इतने स्टार

पंकज शुक्ल
Updated Tue, 09 Mar 2021 08:00 PM IST
द मैरीड वूमन
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डिजिटल रिव्यू: द मैरीड वूमन (वेब सीरीज)
लेखक: मंजू कपूर
कलाकार: ऋद्धि डोगरा, मोनिका डोगरा, सुहास आहूजा, इमाद शाह और नादिरा बब्बर आदि।
निर्देशक: साहिर रजा
ओटीटी: जी5
रेटिंग: **

दीपा मेहता की फिल्म ‘फायर’ याद है आपको? शबाना आजमी और नंदिता दास के निभाए किरदारों के दैहिक संबंधों की पड़ताल करती साल 1996 में रिलीज हुई फिल्म। एकता कपूर की बनाई वेब सीरीज ‘द मैरीड वूमन’ की कहानी उससे चार साल पहले की है। अयोध्या में विवादास्पद ढांचा ढहाए जाने के बाद  के बवाल के बीच रची गई इस कहानी को इसके निर्देशक ने बनाया बिल्कुल आज के अंदाज में है। कहानी न अपने कथ्य में, न अपनी बुनावट में और न ही अपने प्रस्तुतीकरण में साल 1992 की याद दिला पाती है। सब कुछ आज जैसा लगता है। नकली जैसा लगता है।
द मैरीड वूमन
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महिला दिवस भी धीरे धीरे फिल्मकारों के लिए अपनी फिल्में और सीरीज बेचने की वैसी ही तारीख भर हो चला है जैसे बड़े प्रोडक्शन घराने होली, दीवाली की तारीखों को अपनी फिल्में रिलीज करने के लिए मानते रहे हैं। इस सीरीज में कहानी दो महिलाओं की है। एक ने अपना घर बसाया। पति के साथ अच्छा समय बिताया। बच्चे पैदा किए और अब उसे जिंदगी नीरस लगने लगी है। नाटक के एक अभिनेता से उसकी मुंहाचाही होती है। और, फिर कहानी में आती है पीपिलका खान। शेक्सपीयर भले कह गए हों कि नाम में क्या रखा है लेकिन यहां आस्था कालरा और पीपिलिका खान के नाम ही उनकी पहचान हैं। सिर्फ नाम से अपने अपने किरदारों का बायोडाटा बता देने वाले। दोनों मिलती हैं। दूसरी पहली से कहती हैं कि उसे बंदे से प्यार होता है, उसके महिला या पुरुष होने से नहीं।
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द मैरीड वूमन
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समलैंगिकता का सिनेमा नया नहीं है। लेकिन, इस सिनेमा को बनाने के लिए किसी को अधूरा दिखाने की जरूरत भी नहीं है। समलैंगिकता बीमारी नहीं है और न ही ये दिमाग का कोई फितूर है। इसे समझना उन फिल्मकारों के लिए बहुत जरूरी है जो इस विषय पर सिनेमा या सीरीज बना रहे हैं, या बनाना चाहते हैं। एकता कपूर और तुषार कपूर का अविवाहित रहते हुए भी किराए की कोख से मां या पिता बनना भले कानूनन ठीक न हो लेकिन कहानियां वहां भी हैं। और, कहानियां वहां भी है जहां करण जौहर खुद को ‘अनसूटेबल ब्वॉय’ कहलाने में हिचकते नहीं हैं। परदे पर ऐसे बिंदास लोगों की बिंदास कहानियां बनाए जाने की जरूरत है।
द मैरीड वूमन
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1992 में जाकर डरते सहमते शादीशुदा स्त्री का देह बोध बताने की जरूरत 1996 में भले रही हो पर 2021 में कहानी नई सदी की ही होनी चाहिए। और, इसे पुराना रखना ही है तो फिर उस दौर की संवेदनाएं बताने वाला एक उस्ताद जरूर साथ में रखना चाहिए। निर्देशक साहिर रजा का निर्देशन यहां शुरू से आखिर तक अपना असर नहीं छोड़ पाता है तो इसकी वजह है एक सच्ची कहानी को उन्होंने एकता कपूर के धारावाहिकों के अंदाज में बना दिया है। आस्था की दुनिया शुरू में जैसी उन्होंने सजाई है वे रंग बाद में अलहदा रंगों को परदे पर चढ़ने नहीं देते। कहानी में दृश्य बदलते रहने की भी बहुत गुंजाइश नहीं है। ये सीरीज सबक इस बात का भी है कि हर किताब परदे पर उतारने लायक ही हो, जरूरी नहीं है।
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द मैरीड वूमन
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वेब सीरीज ‘द मैरीड वूमन’ के किरदार तो कमजोर हैं ही, आस्था को दर्शकों से सीधे बात कराने का प्रयोग भी अटपटा है। फोर्थ वॉल से बात करने की एक वजह होती है। यहां तो जो होते दिख रहा है, उसे अलग से भी बताने की जरूरत क्या है? और, जो कुछ परदे पर घट रहा है अगर उसे भी समझाने की जरूरत है तो फिर ऐसी सीरीज बनाने की जरूरत ही क्या है? सीरीज तकनीकी रूप से प्रभावित नहीं कर पाती है। कलाकारों में ऋद्धि डोगरा ने एक तरह से पूरी सीरीज अकेले अपने कंधों पर खींचने की कोशिश की है। इमाद शाह को अच्छे रोल चुनने चाहिए। मोनिका डोगरा की भी कास्टिंग यहां गड़बड़ है, वह पीपिलिका खान एक भी सीन में नहीं लग पाईं। पांच घंटे इस सीरीज में लगाने से बेहतर है कि मंजू कपूर की किताब फिर से पढ़ ली जाए।
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