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मेरा काव्य

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काश इंसान समझ लेता

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सभी 5 एपिसोड

खुदा बन इंसान,
जब उन जंगलों को काट रहा था,
काश, धड़ाम होते उन बेजुबान,
पेड़ों के चींखें सुन लेता ।

कभी खोज में, कभी खनन में,
जब इस धरती को चीर रहा था,
काश, चलाने से पहले कोई मशीन,
मां की कोख को याद कर लेता ।

विकास का नकाब पहन के,
जब जल-वायु , चर-अचर को छेड़ रहा था,
काश, कुदरत से खिलवाड़ के इस व्यसन में,
बिगड़ते मौसम की मिजाज को समझ लेता ।

जीत की होड़ में, जिंदगी की दौड़ में,
जब संसार के सारे नियमों को तोड़ रहा था,
काश, नियति को नजरंदाज करने से पहले,
क्या खोया?, क्या पाया?,
और बचा क्या? हिसाब कर लेता ।


----- कंतेटि अनिलकुमार
वडोदरा 
 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

Ai zindagi kuchh to bata

24 अप्रैल 20211 mins 15 secs

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता

छुटती सांसें हैं और टूटते अपने हैं
छूटते हैं अपनों के निशा
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला

देखती थी जो आंखें सपने
बह रही है को समन्दर बनकर
हो गया है मन आधिर्ज ये
छूटते अपनों का साथ देखकर

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता।

✍️ दीप्ति पांडेय
 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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Ai jindagi kuchh to bata

24 अप्रैल 20211 mins 15 secs

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता

छूटती सांसें हैं और टूटते अपने हैं
छूटते हैं अपनों के निशां
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला

देखती थी जो आंखें सपने
बह रही है को समन्दर बनकर
हो गया है मन आधिर्ज ये
छूटते अपनों का साथ देखकर

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तूझे है पता।
 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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Thaharo khuchh pal yha

22 अप्रैल 20211 mins 38 secs

ठहरो कुछ पल यहां

ठहरो कुछ पल यहां
ज़रा गौर से देखने तो दो
तुम वही हो ना
ज़रा तसल्ली तो करने दो
 

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