काश इंसान समझ लेता

Anilkumar
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                            खुदा बन इंसान,
                                                                     
                            
जब उन जंगलों को काट रहा था,
काश, धड़ाम होते उन बेजुबान,
पेड़ों के चींखें सुन लेता ।

कभी खोज में, कभी खनन में,
जब इस धरती को चीर रहा था,
काश, चलाने से पहले कोई मशीन,
मां की कोख को याद कर लेता ।

विकास का नकाब पहन के,
जब जल-वायु , चर-अचर को छेड़ रहा था,
काश, कुदरत से खिलवाड़ के इस व्यसन में,
बिगड़ते मौसम की मिजाज को समझ लेता ।

जीत की होड़ में, जिंदगी की दौड़ में,
जब संसार के सारे नियमों को तोड़ रहा था,
काश, नियति को नजरंदाज करने से पहले,
क्या खोया?, क्या पाया?,
और बचा क्या? हिसाब कर लेता ।


----- कंतेटि अनिलकुमार
वडोदरा 
 
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4 months ago

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