ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता

Dipti Pandey
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                            ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
                                                                     
                            
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता

छुटती सांसें हैं और टूटते अपने हैं
छूटते हैं अपनों के निशा
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला

देखती थी जो आंखें सपने
बह रही है को समन्दर बनकर
हो गया है मन आधिर्ज ये
छूटते अपनों का साथ देखकर

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता।

✍️ दीप्ति पांडेय
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 
                                                                     
                            

                                                                     
                            
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4 months ago

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