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कबीर वाणी
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कबीर वाणीः साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए...

15 November 2022

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2:1
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाए मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए। कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमें बस मेरा गुजरा चल जाए,मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूं और आने वाले मेहमानों को भी भोजन करा सकूं... 

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शब्द दुरिया न दुरै, कहूं जो ढोल बजाय |
जो जन होवै जौहोरी, लेहैं सीस चढ़ाय ||

कबीर की वाणी है की शबद (ईश्वर की महिमा) किसी के दूर करने से नहीं छिप सकती है। जो शबद के पारखी होते हैं वो गुरु के वचनों को अपने सर माथे पर धर लेते हैं, उसका मोल समझ कर उसे उचित महत्त्व देते हैं
 

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए ।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आप कितना भी नहा धो लीजिए, लेकिन अगर मन साफ़ नहीं हुआ तो उसे नहाने का क्या फायदा, जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन फिर भी वो साफ़ नहीं होती, मछली में तेज बदबू आती है।

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥

गाली से मरने मारने तक की बात आ जाती है, इससे अपनी हार मानकर जो विरक्त हो चलता है, वो सन्त है, और गाली गलौज एवं झगड़े में जो व्यक्ति मरता है, वो नीच है।
 

वैद्य मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥

कबीरदास जी कहते हैं कि बीमार मर गया और जिस वैद्य का उसे सहारा था वह भी मर गया । यहाँ तक कि कुल संसार भी मर गया लेकिन वह नहीं मरा जिसे सिर्फ राम का आसरा था । अर्थात राम नाम जपने वाला हीं अमर है 

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए ।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ।

इसका यह भावार्थ है कि आपका मन हमेशा शीतल होना चाहिए अगर आपका मन शीतल है तो इस दुनिया में आपका कोई भी दुश्मन नहीं बन सकता।

लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार 

कबीर साहेब ने सदियों पहले दुनिया के इस सबसे बड़े घोटाले के बारे में बताया था कि आपका यह सारा माल ब्राह्मण-पुजारी ले जाता है और भगवान को कुछ नहीं मिलता, इसलिए *मंदिरों में ब्राह्मणों को दान करना बंद करो ।

अवगुण कहूं शराब का, आपा अहमक़ साथ ।
मानुष से पशुआ करे, दाय गाँठ से खात ॥

मैं तुमसे शराब की बुराई करता हूं कि शराब पीकर आदमी आप पागल होता है, मूर्ख और जानवर बनता है और जेब से रकम भी लगती है सो अलग ।

क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।
साँस-साँस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥

इस शरीर का क्या विश्वास है यह तो पल-पल मिटता हीं जा रहा है इसीलिए अपने हर सांस पर हरी का सुमिरन करो और दूसरा कोई उपाय नहीं है 
 

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥

जो शील स्वभाव का होता है मानो वो सब रत्नों की खान है क्योंकि तीनों लोकों की माया शीलवन्त व्यक्ति में ही निवास करती है.

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