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अंबाला
मंटो के अफसाने

सुनिए मंटो का अफसाना : काली शलवार

4 October 2022

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32:22
अंबाला छावनी में उसका धंधा बहुत अच्छी तरह चलता था. छावनी के गोरे शराब पी कर उसके पास आ जाते थे और वो तीन-चार घंटों ही में आठ-दस गोरों को निपटा कर बीस-तीस रुपये पैदा कर लिया करती थी...

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सभी 58 एपिसोड

ये कहानी बंबई के एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के अस्पताल की है. यह अस्पताल बंबई का सबसे मशहूर अस्पताल होता है। अस्पताल की नर्सें डॉक्टर के अकेलेपन को देखकर परेशान रहती हैं। तभी अस्पताल में एक लड़की एबॉर्शन करवाने आती हैं...

ये कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसे अपनी नौकरानी से मोहब्बत हो जाती है. ये नौकरानी उसकी बीमारी में उसकी सेवा करती है लेकिन वो उससे हमेशा कहता रहता है कि वो उससे नफरत करता है...

ये एक ऐसे शख्स की कहानी है जो दिल को बहलाने के लिए शहर में निकलता है लेकिन हर उस जगह उसे घूमने की इजाजत नहीं होती जहां उसका मन लगता है...

ये कहानी एक ऐसे पिता की है जो दंगों में अपनी बेटी की नंगी लाश देख लेता है और उसके सिर पर खून सवार हो जाता है. वो बदले की आग में गैर मजहब के लोगों को निशाना बनाने लगता है...

ये कहानी एक ऐसी महिला की है जिसके चेहरे पर मर्दों की तरह दाढ़ी आती है। एक लड़का उसे बस स्टैंड पर देखकर इतना हैरान होता है कि उसके होश-ओ-हवास ही गुम हो जाते हैं.... 

कुछ दिनों से मोमिन बहुत बेक़रार था। उसको ऐसा महसूस होता था कि उसका वजूद कच्चा फोड़ा सा बन गया था। काम करते वक़्त, बातें करते हुए हत्ता कि सोचने पर भी उसे एक अजीब क़िस्म का दर्द महसूस होता था। ऐसा दर्द जिसको वो बयान भी करना चाहता तो न कर सकता...

फ़र्ख़ंदा बहुत ख़ुश हुई। देर तक दोनों घुल मिल के बातें करती रहीं। नसीमा अब उसे और ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखाई दी। उसकी हर अदा जो मर्दाना तर्ज़ की थी इसे बेहद पसंद आई और वहीं फ़ैसला हो गया कि वो ता-दम-ए-आख़िर सहेलियां बनी रहेंगी...

सुरेंद्र ने उन अधेड़ उम्र की नौकरानियों से अपनी तरफ़ से कोई कोशिश नहीं की थी। वो ख़ुद उसको खींच कर अपनी कोठरियों में ले जाती थीं। मगर सुरेंद्र अब महसूस करता था कि ये सिलसिला उस को अब ख़ुद करना पड़ेगा, हालाँकि उसकी तकनीक से क़तअ’न नावाक़िफ़ था...
 

ये आंखें बिल्कुल ऐसी ही थीं जैसे अंधेरी रात में मोटर कार की हेडलाइट्स जिनको आदमी सब से पहले देखता है। आप ये न समझिएगा कि वो बहुत ख़ूबसूरत आंखें थीं, हरगिज़ नहीं। मैं ख़ूबसूरती और बदसूरती में तमीज़ कर सकता हूँ। लेकिन माफ़ कीजिएगा, इन आंखों के मुआमले में सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूं कि वो ख़ूबसूरत नहीं थीं। लेकिन इसके बावजूद उनमें बेपनाह कशिश थी... 

बरसात

1 December 202215 mins 41 secs

मंटो का अफसाना : बू

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवान के इस स्प्रिंगदार पलंग पर जो अब खिड़की के पास से थोड़ा इधर सरका दिया गया था एक घाटन लौंडिया रणधीर के साथ चिपटी हुई थी...

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