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परमवीर: आज भी सैनिकों के साथ हैं वीर अरुण खैत्रपाल

25 January 2023

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भारत-पाकिस्तान के बीच हुई तीसरी जंग का जिक्र जब-जब होगा तब-तब आपको भारत के उन सूरमाओं की कहानियां सुनने को मिलेंगी जिन्हें सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। इन सूरमाओं में से ही एक हैं शहीद सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल  

परमवीर: आज भी सैनिकों के साथ हैं वीर अरुण खैत्रपाल

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आजादी के बाद जब पाकिस्तान ने अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देना शुरू किया, तो भारतीय सैनिकों ने उसका न केवल डटकर मुकाबला किया, बल्कि उसे शिकस्त का एक ऐसा जख्म दिया, जो आज तक नहीं भर पाया है...

हार से बौखलाए विरोधी ने 6 फरवरी को टैनधार पर हमला कर दिया. जहां पाकिस्तान का मुकाबला जदुनाथ सिंह से हुआ, वही जदुनाथ सिंह, जिन्होंने मुठ्ठीभर साथियों के साथ विरोधियों पर जमकर गोलियां बरसाई और अंतत: भारत की जीत सुनिश्चित करते हुए शहीद हो गए..

कौन थे वो कबाइली जिन्होंने स्वतंत्र भारत पर पहला हमला किया, और कैसे मिला हमें हमारा पहला परमवीर... इस खास श्रृंखला में हम जानेंगे कहानी उन शहीदों की जो कहलाए परमवीर...

20 साल की उम्र में अब्दुल हमीद ने भारतीय सेना की वर्दी पहनी, 1965 की जंग में अदम्य वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बसंतर की लड़ाई का बड़ा योगदान है। बसंतर की लड़ाई में एक टुकड़ी का नेतृत्व मेजर होशियार सिंह कर रहे थे। 1971 के युद्ध के लिए चार जांबाज सैनिकों को परमवीर चक्र से पुरस्कृत किया गया।

जम्मू-कश्मीर के काद्याल गांव की एक पहचान यह भी है कि वहां 6 जनवरी 1949 को बाना सिंह का जन्म हुआ था. आम बच्चों की तरह छोटी उम्र से ही उनकी नन्हीं आंखों में कुछ सपने थे. भारतीय सैनिक बनना इन्हीं में से एक था

भारत के सैनिकों ने न सिर्फ मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है बल्कि जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों में भी शांतिबहाली में अहम भूमिका निभाई है। विदेश की धरती पर शांति स्थापित करने के लिए कुर्बान होने वाले एक सैनिकों में मेजर रामास्वामी परमेश्वरन भी शामिल हैं।

"अगर कोई आदमी कहता है कि वह मरने से नहीं डरता है, तो वह झूठ बोल रहा है. या फिर वह गोरखा है"...फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के इन शब्दों को कारगिल युद्ध के दौरान शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडे ने चरित्रार्थ किया
 

भारत-पाकिस्तान के बीच हुई तीसरी जंग का जिक्र जब-जब होगा तब-तब आपको भारत के उन सूरमाओं की कहानियां सुनने को मिलेंगी जिन्हें सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। इन सूरमाओं में से ही एक हैं शहीद सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल
 

13 अक्टूबर, 1948. ये वो तारीख़ है, जब पाकिस्तान ने टिथवाल की रीछमार गली से हमला कर भारतीय सेना को पीछे धकेलने की कोशिश की. मगर मौके पर मौजूद सिख रेजिमेंट के एक जवान ने उनकी इस कोशिश को सफल नहीं होने दिया...

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