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महिलाओं की प्रेरणा: चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर कैसे बनी शूटर दादी, जानिए इनके बारे में सबकुछ

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Mon, 27 Sep 2021 12:41 PM IST
शूटर दादी
शूटर दादी - फोटो : facebook/IndiainSingapore
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महिलाएं घर-परिवार संभालती हैं, सरकार चलाती हैं, प्लेन उड़ाती हैं और वो हर काम करती हैं जो एक पुरुष करता है। लेकिन महिलाएं बस इतने तक सीमित नहीं है। महिलाएं मानसिक तौर पर भले ही कितनी भी सशक्त क्यों न हों उन्हें शारीरिक तौर पर कमजोर ही समझा जाता है लेकिन दुनिया भर की कई महिलाओं ने अपने सशक्त व्यक्तित्व से इस बात को भी झुठला दिया है। मैरी कोम, मीरा बाई चानू अपनी बाजुओं के दम पर देश का मान बढ़ा रहीं है तो उम्र की सीमा से परे हमारे देश के दादियां बंदूक दाग रहीं है। हम बात कर रहे हैं शार्प शूटर दादी की। आपने साल 2019 में आई फिल्म सांड की आंख तो देखी ही होगी। इस फिल्म में तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर ने दो ऐसी बुजुर्ग महिलाओं का किरदार निभाया है जो देश के लिये निशानेबाजी करतीं हैं। ये फिल्म कोई काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि देश की दो शूटर दादियों के संघर्ष पर आधारित सच्ची घटना है। चलिये जानते हैं उन दोनों शूटर दादी के बारे में, जो हर महिला के लिए प्रेरणा बन गईं।

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शूटर दादी कौन हैं

उत्तर प्रदेश की दो बुजुर्ग महिलाएं हैं जो शूटर दादी या रिवॉल्वर दादी के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन महिलाओं का असली नाम चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर है। दोनों रिश्ते में जेठानी और देवरानी हैं। दोनों बागपत की रहने वाली हैं। इसी साल अप्रैल में कोरोना की चपेट में आकर दादी चंद्रो तोमर का निधन हो गया है।


चंद्रो तोमर का जीवन परिचय

चंद्रो तोमर का जन्म एक जनवरी 1932 में शामली जिले में हुआ था। चंद्रो तोमर के पति का नाम भोर सिंह तोमर था। चन्द्रो शादी के याद बागपत में बस गईं, जहां उनके देवर से प्रकाशी तोमर की शादी हुई और दोनों का रिश्ता बन गया।


प्रकाशी तोमर के बारे में जानें

प्रकाशी तोमर का जन्म 1937 को मुजफ्फरनगर में हुआ था। प्रकाशी की शादी बागपत के जोहरी गांव के निवासी जय सिंह से हुई। प्रकाशी तोमर की दो बेटियां हैं।


देवरानी-जेठानी कैसे बनी 'शूटर दादी'

चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर दोनों की आधी उम्र घर को गृहणी बने रहते बीत गयी। घर परिवार सम्भालना, बच्चे और चूल्हे चौके के आगे दोनों के जीवन मे कुछ न था। हालांकि वक्त बदला दोनों विश्व भर में शूटर दादी के नाम से विख्यात हो गईं।

दरअसल, प्रकाशी तोमर की बेटी शूटिंग सीखना चाहती थीं। प्रकाशी उन्हें रोजरी रायफल क्लब में ले गईं और बेटी का मनोबल बढ़ाने के लिए पिस्टल हाथ मे थाम फायरिंग कर दी। किस्मत थी या लक्ष्य भेदने की चाह, निशाना सटीक लगा, जिसके बाद रोजरी क्लब के कोच ने प्रकाशी को ही क्लब जॉइन करने को कहा।


चन्द्रो और प्रकाशी तोमर का खूब बना मजाक

जब उन्होंने निशानेबाजी शुरू की तो प्रकाशी 65 साल की थीं। परिवार इसके पक्ष में नहीं था तो वह छिप छिप के निशानेबाजी की ट्रेनिंग लेने जाती थीं। इस काम में उनका साथ दिया प्रकाशी के जेठानी चन्द्रो ने। दोनों ने निशानेबाजी की ट्रेनिंग शुरू की तो लोग उनका तरह तरह से मज़ाक बनाने लगे।

लेकिन उन सब की बोलती तब बन्द हो गयी जब दिल्ली में निशानेबाजी के मुकाबले में शूटर दादी ने दिल्ली के डीआईजी को ही शूटिंग में हराकर गोल्ड जीता। इसके बाद वह प्रतियोगिता में भाग लेने लगीं और प्रसिद्ध होने लगीं। वरिष्ठ नागरिक वर्ग में इस जोड़ी को कई अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। खुद राष्ट्रपति की ओर से इन्हें स्त्री शक्ति सम्मान से नवाजा है।

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