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मिलिए देव्यागिरी से, यूपी की पहली और इकलौती महिला महंत, जिन्होंने 22 साल की उम्र में ले लिया था संन्यास

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Mon, 01 Nov 2021 11:33 AM IST
महंत देव्यागिरी
महंत देव्यागिरी - फोटो : facebook/DevyaGiriOfficial
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नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं। कन्या पूजन करते हैं। हमारे देश में देवी की उपासना की जाती है। हजारों लाखों बड़े- छोटे मंदिर हैं, जहां माता की मूर्ति स्थापित है और पुजार व महंत उनकी पूजा व आरती करते हैं। लेकिन इन हजारों लाखों मंदिरों में कितनी महिला पुरोहित या महंत हैं जो पुरूषों की तरह मंदिर में भगवान की आराधना करती हैं? शादी में मंत्रोच्चारण करती हैं  या आपके घर में होने वाली पूजा में कथा कहती हैं? आपको शायद ऐसी महिला पंडितों का नाम न पता हो लेकिन हमारे देश में महिला पुरोहित और महंत भी हैं। जब दीया मिर्जा की शादी की रस्में एक महिला पुरोहित ने कराई तो ये बड़ी बात मानी गई।  उस महिला पुरोहित का नाम है शीला अत्ता। कई दिनों तक दीया मिर्जा की शादी शीला अत्ता के कारण सुर्खियों में रही। कुंभ में महिला साध्वियों को अधिक नेतृत्व देने की मांग भी कई बार उठी। कुल मिलाकर महिलाओं की धर्म की रक्षक के तौर पर सहभागिता बढ़ी है। आज हम ऐसी ही एक महिला महंत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके जीवन की एक घटना ने उन्हें लखनऊ के प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर का महंत बना दिया। जानिए महंत देव्यागिरी के बारे में, जिन्होंने 22 साल की उम्र में संन्यास लिया और फिर बन गईं यूपी की पहली और इकलौती महिला महंत। 
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देव्यागिरी का जन्म, परिवार और शिक्षा

देव्यागिरी का जन्म उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले में हुआ था। देव्यागिरी बचपन से कुछ अलग करने की चाह रखती थीं। बड़ी हुईं तो  बीएससी डिप्लोमा ऑफ पैथालाॅजी में डिग्री हासिल की। फिर बाद में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उन्होंने कभी महंत बनने का नहीं सोचा था। उनका सपना तो मेडिकल प्रोफेशन में रहकर मानव सेवा करना था। देव्यागिरी पढ़ाई पूरी करके पैथोलॉजिस्ट बनने के लिए मुंबई जाने की तैयारी में थीं। लेकिन उनके साथ एक ऐसी घटना हुई जिसके बाद उनके जीवन का मार्ग और उनके सपने बदल गए।


मुंबई जाने वाली थीं देव्यागिरी, मनकामेश्वर मंदिर बन गया ठिकाना

देव्यागिरी अक्सर मंदिर जाया करती थीं। जब अपने सपने को साकार करने के लिए वह घर से मुंबई जा रहीं थीं, तो उनके मन में ख्याल आया कि भोले बाबा का दर्शन करके उनका आशीर्वाद ले लिया जाए। देव्यागिरी लखनऊ पहुंची और वहां के प्राचीन मनकामेश्वर मंदिर में दर्शन करने गई। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि मंदिर के गर्भगृह में भोलेनाथ के दर्शन करने पर उन्हें आंतरिक तौर पर कुछ परिवर्तन होने का आभास हुआ। उनका अंतर्मन देव्यागिरी को वहां से कहीं और जाने से रोक रहा था। देव्यागिरी ने उसी समय ठान लिया कि अब वह अपना पूरा जीवन भोलेनाथ को समर्पित कर देंगी।

पैथोलॉजिस्ट से कैसे बनी देव्यागिरी महंत

जब देव्यागिरी ने घर छोड़ा तो वह मात्र 22 साल की थीं। इतनी कम उम्र में देव्यागिरी ने संन्यास ले लिया। उस समय देव्यागिरी को संन्यास क्या होता है, यह भी ठीक से मालूम नहीं था। साल 2002 में 10 जनवरी को देव्यागिरी ने संन्यास के लिए पहली बार दीक्षा ली। फिर दो साल बाद साल 2004 में जब कुंभ का आयोजन हुआ तो देव्यागिरी ने पूर्ण संन्यास ले लिया। उनके लिए ये सब कर पाना आसान नहीं था। सबसे पहले तो देव्यागिरी ने महंत केशव गिरी को अपना गुरु बनाया लेकिन उन्होंने देव्यागिरी को स्वीकार नहीं किया। हालांकि बाद में देव्यागिरी की आस्था व भोलेनाथ के प्रति विश्वास को देखकर मान गए। 9 सितंबर साल 2008 में देव्यागिरी को मनकामेश्वर मंदिर का महंत बना दिया गया। देव्यागिरी जब महंत बनी तो साधु संतो के ताने सुनने पड़े। लोग एक महिला को महंत के तौर पर नहीं देखना चाहते थे। देव्यागिरी ने सबकुछ धैर्यपूर्वक सुना लेकिन अपने मार्ग पर अडिग रहीं और आज तीन सालों बाद उनको वह सम्मान मिल रहा है जो किसी भी महंत को मिलता है।
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